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वीज़ा के लिए प्रतीक्षा
निस्संदेह विदेशी जानते हैं कि भारत में छुंआछूत की बीमारी है। लेकिन निकट पड़ोसी न होने के कारण वे यह नहीं समझते कि वास्तव में कितने अछूत हैं। उनके लिए यह समझना कठिन है कि बहुत से हिन्दुओं के गांव के किनारे कुछ अछूत कैसे रहते हैं उन्हें कैसे प्रतिदिन गांव की गंदगी साफ करनी पड़ती है। कैसे हिन्दुओं के जाकर दूर से ही खाना लेना पड़ता है और हिन्दू बनियों की दुकानों से मसाले और तेल आदि दूर से ही खरीदने पड़ते हैं। वे गांव को हर प्रकार से अपना घर समझते हैं लेकिन वे किसी गांव वाले को नहीं छू सकते और न ही उन्हें कोई छू सकता है। समस्या यह है कि जिस प्रकार का व्यवहार सवर्ण हिन्दुओं द्वारा अछूतों से किया जाता है उसे अति उत्तम ढंग से कैसे बताया जाए। यह उद्देश्य दो तरीकों से पूरा किया जा सकता है। एक तो यह है कि उनके साथ जो व्यवहार होता है उसका सामान्य ब्यौरा दिया जाए और दूसरा तरीका यह है कि इसके कुछ दृष्टांत दिए जाएं। मेरा विचार है कि दूसरा तरीका अधिक प्रभावशाली होगा। इन उदाहरणों का चयन करते समय मैंने कुछ अपने अनुभव और कुछ दूसरों के अनुभव लिए हैं। मैं उन घटनाओं से आरम्भ करता हूँ जो मेरे जीवन में घटित हुई हैं।
एक
आरम्भ में हमारा परिवार बम्बई प्रेसीडेन्सी के रत्नागिरी जिले के दपोली तालुका में रहता था। ईस्ट इंडिया कम्पनी का शासन आरम्भ होते ही मेरे पूर्वज अपने पैतृक पेशे को छोड़कर कम्पनी की फौज में नौकरी करने लगे। मेरे पिताजी ने भी पारिवारिक परम्परा का पालन किया और सेना में नौकरी करते हुए वे एक अधिकारी के पद पर पहुंचे और सूबेदार के रूप में सेवानिवृत्त हुए। मेरे पिता सेवानिवृत्ति के पश्चात् अपने परिवार को लेकर दपोली पहुंचे जहां वह बसना चाहते थे। लेकिन कुछ कारणों से उन्होंने अपना विचार बदल दिया। हमारा परिवार दपोली से सतारा पहुंचा जहां हम 1904 तक रहे।