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पहली घटना जो मुझे याद है और जिसका मैं उल्लेख कर रहा हूँ वह लगभग 1901 में घटी जब हम सतारा में थे। मेरी मां तब मर चुकी थीं। मेरे पिता दूर सतारा जिले के
खातव तालुका के कोरेगांव (गोरेगाँव) में खजांची थे जहाँ बम्बई की सरकार ने सूखे से पीडि़त लोगों को, जो भूख के कारण मर रहे थे, रोजगार देने के उद्देश्य से तालाब
खोदने का काम आरम्भ कर रखा था। जब मेरे पिता कोरेगाँव गए तो वह मुझे मेरे भाई, जो मुझसे बड़ा था, और मेरी बड़ी बहन जो मर चुकी थीं, के दो बच्चों को मेरी चाची और कुछ दयालु पड़ोसियों की देखरेख में छोड़ गए। मैं जानता हूँ कि मेरी चाची बहुत दयालु थीं लेकिन वह हमारी कोई सहायता नहीं कर सकती थीं वे बौनी थीं और उनकी टाँगों में कुछ खराबी थी जिससे वह बिना किसी की सहायता के चल-फिर नहीं सकती थीं। उन्हें अक्सर उठाना पड़ता था। मेरी बहनें थीं। वे शादीशुदा थीं और अपने परिवार के साथ दूर रहती थीं। अपना खाना बनाना हमारे लिए समस्या बन गया था। खासतौर से इसलिए कि हमारी चाची असहाय होने के कारण यह काम नहीं कर सकती थीं। हम चार बच्चे विद्यालय जाने वाले थे और हम अपना खाना भी स्वयं बनाते थे। हम रोटी नहीं बना सकते थे। इसलिए हम पुलाव पर गुज़ारा करते थे जिसे बनाना हमारे लिए आसान था, क्योंकि उसमें केवल चावल और माँस को ही मिलाना पड़ता था।
खजांची होने के कारण हमारे पिता हमारे पास सतारा आने के लिए अपना कार्यालय नहीं छोड़ सकते थे। अतः उन्होंने हमें कोरेगाँव आने और गर्मी की छुट्टिठ्ठयाँ वहीं उनके साथ बिताने के लिए लिखा। हम बच्चों को इस पर बड़ी उत्सुकता हुई क्योंकि हमने तब तक रेलवे स्टेशन नहीं देखा था।
बड़ी तैयारियाँ की गईं। यात्रा के लिए अंग्रेजनुमा चमकीली सितारों वाली टोपियां, नए जूते, नई रेशमी किनारों की धोती दे दी गई। रास्ते की सम्पूर्ण जानकारी पिताजी ने दे दी थी और उन्होंने हमें यह सूचित करने के लिए लिखा था कि हम किस तरह चलेंगे ताकि वह स्टेशन अपने चपरासी को भेज सकें, जो हमें मिले और कोरेगाँव ले जाए। जैसा कि पिताजी चाहते थे, मैं, मेरा भाई और मेरी बहन का एक लड़का सतारा से चल पड़े और अपनी चाची को पड़ोसियों की देखरेख में छोड़ दिया जिन्होंने उनकी देखभाल करने का वादा किया। हमारे स्थान से स्टेशन 10 मील दूर था और हमें स्टेशन ले जाने के लिए एक ताँगा किराए पर लिया गया। हमने विशेष रूप से इस अवसर के लिए बनाए गए कपड़े पहने हुए थे और खुशी से हमने घर छोड़ा। लेकिन जिस समय हमने घर छोड़ा हमारी चाची दुःखी थीं।
हम स्टेशन पहुँचे तो मेरे भाई ने टिकटें खरीदीं और मुझे तथा मेरी बहन के लड़के को दो-दो आने जेबखर्च के लिए दिए ताकि हम जैसे चाहें उन्हें खर्च कर सकें। हम