दो - बड़ौदा - Page 25

10 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

रखते हैं। यह सुनकर कि वहाँ एक सराय है जो पारसी चलाते हैं मेरा हृदय प्रफुल्लित हुआ। पारसी ज़ारोष्ट्रियन धर्म को मानते हैं। वहां मुझे इस बात का कोई डर नहीं था कि वे मेरे साथ अछूतों जैसा व्यवहार करेंगे क्योंकि उनका धर्म छुआछूत नहीं मानता। प्रसन्नचित्त और आशा तथा खुले दिमाग से निडर होकर मैंने अपना सामान ताँगे में रखा और ताँगेवाले को शिविर की ओर पारसी सराय में चलने के लिए कहा।

सराय दो मंजिला इमारत थी जिसके भूतल पर एक बूढ़ा पारसी अपने परिवार के साथ रहता था। वह देखभाल करने वाला था और जो लोग वहाँ ठहरने के लिए आते थे उनको भोजन देता था। ताँगा वहाँ पहुँचा तो पारसी रखवाला मुझे ऊपर ले गया। मैं ऊपर चला गया और ताँगेवाला चालक मेरा सामान ऊपर ले गया। मैंने उसे पैसे दिए और वह चला गया। मैं प्रसन्न हुआ कि अन्ततः मैंने अपने ठहरने के लिए जगह ढूँढने की समस्या हल कर ली है। मैं कपड़े उतार रहा था क्योंकि मैं आराम करना चाहता था। इस बीच सराय का रखवाला अपने हाथ में एक किताब लेकर आया। चूँकि मैं अर्धनग्न अवस्था में था उसने देख लिया है कि मैंने सदरा या कास्ती जो पारसी पहनते हैं नहीं पहने हुए था। यह देखते ही उसने तेज आवाज में पूछा कि मैं कौन हूँ? यह जानते हुए कि यह सराय पारसी सम्प्रदाय द्वारा केवल पारसियों के लिए चलाई जा रही है, मैंने उससे कहा कि मैं हिन्दू हूँ। यह जानकर वह स्तब्ध रह गया और कहने लगा कि मैं सराय में नहीं ठहर सकता। उसके व्यवहार से मुझे बड़ा धक्का लगा ओर मैं ठण्डा पड़ गया। मेरे मन में फिर प्रश्न आया कि कहाँ जाऊँ? अपने को सँभालते हुए मैंने उसे बताया कि मैं हिन्दू हूँ मुझे यहाँ ठहरने में कोई आपत्ति नहीं है यदि उसे कोई आपत्ति न हो। उसने उत्तर दिया, फ्तुम कैसे रह सकते हो। मुझे उन सबका रजिस्टर में नाम लिखना होता है जो यहाँ ठहरते हैं।य् मुझे उसकी समस्या समझ में आई। मैंने कहा कि मैं रजिस्टर में लिखने के लिए कोई पारसी नाम रख लेता हूँ। फ्यदि मुझे कोई एतराज नहीं है तो तुम क्यों एतराज करते हो। तुम्हें कोई हानि नहीं होगी, यदि मैं यहाँ ठहरता हूं, तो तुम्हें कुछ कमाई होगी।य् मैं समझ गया कि वह मुझे रखने के लिए तैयार है। स्पष्ट है कि उसके पास काफी समय से कोई पर्यटक नहीं आया था और हव थोड़ा पैसा कमाने का अवसर खोना नहीं चाहता था। वह इस शर्त पर राजी हो गया कि मैं डेढ़ रुपया प्रतिदिन ठहरने के लिए दूँगा और उसके रजिस्टर में अपना कोई पारसी नाम लिखूँगा। वह नीचे चला गया और मैंने चैन की सांस ली। समस्या सुलझ गई थी और मैं प्रसन्न हुआ। लेकिन खेद है कि मेरी वह खुशी ज्यादा देर नहीं चली। लेकिन इससे पहले कि मैं उस समय में अपने निवास के दुःखद अंत का बयान करूँ, मैं यह अवश्य बताऊँगा कि मैं जो थोड़ा समय वहाँ रहा वह मैंने कैसे बिताया।

सराय की पहली मंजिल पर एक छोटा-सा शयन-कक्ष था और इसके साथ एक