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छोटा-सा गुसलखाना था जिसमें एक पानी का नल था। इसके अतिरिक्त एक बड़ा कमरा था। जिस समय मैं वहाँ ठहरा हुआ था बड़े हॉल में इस प्रकार के कूड़े-करकट, तख्तों, बेंचों, टूटी कुर्सियों इत्यादि से भरा हुआ था। इसके बीच में मैं अकेला था। प्रातः सराय का रखवाला ऊपर कप में चाय लेकर आया। इसके बाद वह फिर 9ः30 बजे मेरा नाश्ता या सवेरे का खाना लेकर आया। तीसरी बार वह रात 8ः30 को मेरा खाना लेकर आया। सराय का रखवाला मेरे पास तभी आता था जब बहुत आवश्यक होता था। और वह जब भी आया, मेरे से बात करने के लिए नहीं रुका। किसी प्रकार दिन बीत गया।
बड़ौदा के महाराजा ने मुझे महालेखापाल के कार्यालय में प्रोवेशनर नियुक्त किया था। मैं प्रातः करीब 10 बजे कार्यालय के लिए सराय से जाता था और शाम को देर से आठ बजे लौटता था और अधिक से अधिक समय अपने मित्रों के साथ सराय से बाहर बिताता था। रात बिताने के लिए लौटने का ख़याल मन में आने पर मैं भयभीत हो जाता था और सराय में केवल इसलिए आता था कि मरे पास आराम करने के लिए कोई दूसरा स्थान नहीं था। सराय की पहली मंजि़ल पर बड़े कमरे में कोई दूसरा मनुष्य नहीं था जिससे मैं बात कर सकूँ। मैं बिल्कुल अकेला था। पूरे हॉल में अंधेरा रहता था। अंधेरा दूर करने के लिए वहाँ न बिजली की रोशनी थी और न ही कोई दीपक ही था। रखवाला मेरे प्रयोग के लिए एक छोटा-सा लालटेन लेकर आता था। उसकी रोशनी कुछ इंचों से आगे नहीं जा सकती थी। लेकिन मैंने महसूस किया कि मैं काल-कोठरी में हूं और बात करने के लिए किसी व्यक्ति का साथ चाहता था। किन्तु वहाँ कोई नहीं था। किसी व्यक्ति के साथ के अभाव में पुस्तकें मेरी साथी थीं। उनको पढ़ता ही रहता था। पढ़ने में तल्लीन होने के कारण मैं अपना अकेलापन भूल गया। लेकिन चमगादड़ों की चींचीं और उनके उड़ने से, जिन्होंने हॉल को अपना घर बना रखा था, मेरा ध्यान प्रायः भंग हो जाता था और मैं काँपने लगता था और भूलने का प्रयास करने के बावजूद मुझे याद आने लगता था कि मैं विचित्र परिस्थितियों में विचित्र स्थान पर हूँ। कई बार मुझे गुस्सा भी आया लेकिन मैंने अपने दुःख और गुस्से को यह सोचकर दबा लिया कि यद्यपि यह काल कोठरी है, फिर भी सिर छिपाने की जगह है और कोई जगह न होने से कुछ जगह होना बेहतर है। मेरी दशा हृदय-विदारक थी। जब बम्बई से मेरा भान्जा मेरा बचा हुआ सामान लेकर आया, और जब उसने मेरी हालत देखी तो इतना जोर से चिल्लाने लगा कि मुझे उसे तुरंत वापस भेजना पड़ा। मैं इस हालत में पारसी-सराय में पारसी बनकर रहता था। मैं जानता था कि मैं नाम बदलकर बहुत समय तक नहीं रह सकता और एक दिन मेरी पोल खुल जाएगी। इसलिए मैं ठहरने के लिए सरकारी बंगला लेने का प्रयास कर रहा था। लेकिन प्रधानमंत्री ने मेरी अर्जी पर जल्दी गौर नहीं किया, जैसा कि मैं चाहता था। मेरी अर्जी एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी को भेजी गई और इससे पहले कि मुझे अन्तिम उत्तर मिलता, मेरी कयामत का दिन आ गया।