दो - बड़ौदा - Page 29

14 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

सेवाएं अर्पित करना है जिसने मेरी पढ़ाई का खर्च उठाया था। लेकिन मुझे केवल ग्यारह दिन ठहरने के बाद बड़ौदा छोड़ना पड़ा और बम्बई वापस आना पड़ा।

लाठियों से लैस भीति की तरह मेरे सामने खड़े एक दर्जन पारसी और उनके सामने दया की भीख मांगते हुए मेरे भयभीत खड़े होने का दृश्य 18 वर्ष की लम्बी अवधि के पश्चात् भी मेरी दृष्टि से विलीन नहीं हुआ है। मुझे अब भी वह दृश्य बड़ी अच्छी तरह याद है और मुझे अब भी जब उसकी याद आती है तो मेरी आँखों में आँसू आ जाते हैं। उस समय मुझे पहली बार मालूम हुआ कि एक व्यक्ति, जो एक हिन्दू के लिए अछूत है, वह एक पारसी के लिए भी अछूत है।