दो - बड़ौदा - Page 28

13

रखा। उसने कहा, फ्यदि तुम मेरे घर में आते हो तो मेरे नौकर चले जाएंगे।य् मैं इशारा समझ गया ओर मैंने जगह देने के लिए उस पर दबाव नहीं डाला। मैंने भारतीय ईसाई मित्र के पास जाना पसंद नहीं किया। एक बार उसने अपने साथ रहने के लिए आमंत्रित किया था। लेकिन मैंने पारसी सराय में ठहरना अच्छा समझ मना कर दिया था। मेरा कारण यह था कि उसकी आदतें मेरे अनुकूल नहीं थीं अब वहाँ जाने का अर्थ दो-टूक जवाब सुनना था। इसलिए मैं अपने कार्यालय चला गया। लेकिन मैं ठहरने का स्थान पाने का विचार छोड़ नहीं सका। अपने एक मित्र की सलाह पर मैंने उसके पास जाने और उससे पूछने का फैसला किया कि क्या वह मुझे अपने पास जगह देगा। मेरे पूछने पर उसने उत्तर दिया कि कल उसकी पत्नी बड़ौदा आ रही है और वह उससे बात करेगा। बाद में मुझे पता चला कि यह बहुत ही व्यवहार-कुशल उत्तर था। वह और उसकी पत्नी मूल रूप से ऐसे परिवार से थे जो जाति के ब्राह्मण थे और ईसाई बनने के बाद पति के विचार तो उदार हो गए थे लेकिन पत्नी रूढि़वादी रही और वह एक अछूत को अपने घर में रखने के लिए कभी तैयार न हुई होती। इस प्रकार आशा की अन्तिम किरण भी जाती रही। जब मैं अपने भारतीय ईसाई मित्र के घर से चला तो शाम के 4 बजे थे। मेरे सामने सबसे बड़ा प्रश्न था, कि कहाँ जाऊँ। मुझे सराय अवश्य छोड़नी थी और मेरा ऐसा कोई मित्र नहीं जिसके पास जाता। केवल एक ही रास्ता बचा था कि बम्बई चला जाऊँ।

बम्बई के लिए रेल रात को 9 बजे चलती थी। मुझे पाँच घंटे बिताने थे उनको मैं कहाँ बिताऊँ? क्या मैं सराय में जाऊँ? मैं सराय में जाने के लिए हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। मुझे डर था कि कहीं पारसी वहाँ आकर मुझ पर हमला न कर दें। मैं अपने मित्र के पास नहीं जाना चाहता था। यद्यपि मेरी दशा दयनीय थी, मैं नहीं चाहता था कि कोई मेरे ऊपर तरस खाए। मैंने कामथी-बाग नामक सार्वजनिक उद्यान में पांच घंटे बिताने का निश्चय किया। यह उद्यान शहर और शिविर से लगा हुआ है। मेंने वहाँ कुछ समय खाली बैठकर बिताया। मैंने कुछ समय, जो कुछ मेरे साथ हुआ, उस पर दुःख करने में बिताए और कुछ समय मां-बाप के बारे में सोचने में बिता दिए जैसे बच्चे असहाय होने पर करते हैं। मैं शाम के 8 बजे बगीचे के बाहर आया। एक ताँगे में सराय गया। सराय में ऊपर से अपना सामान नीचे ले आया। सराय का रखवाला बाहर आया लेकिन न मैं और न ही वह एक दूसरे से कुछ कह सके। उसने महसूस किया कि वह किसी न किसी प्रकार से उसे परेशानी में डालने के लिए जिम्मेवार था। मैंने उसका पैसा चुकाया। उसने चुपचाप ले लिया और चला गया। मैं बड़ी आशा के साथ बड़ौदा गया था। मैंने कई प्रस्ताव छोड़ दिए थे। वह लड़ाई का समय था। भारतीय शिक्षा-सेवा में कई स्थान रिक्त थे। मैं लन्दन में कई प्रभावशाली व्यक्तियों को जानता था लेकिन मैं किसी को तलाश नहीं पाया। मैंने सोचा कि मेरा पहला कर्त्तव्य बड़ौदा के महाराजा को अपनी