18 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
रमजान का महीना था, मुसलमान इस माह रोजा रखते हैं। किले के फाटक के बिल्कुल पास एक छोटा-सा तालाब है जो लबालब भरा रहता है। उसके चारों ओर चौड़े पत्थर का खड़ंजा है। यात्रा के दौरान हमारे चेहरे, शरीर और कपड़े धूल में सन गए थे और हम सभी नहाना चाहते थे। बिना सोचे समझे कुछ लोगों ने तालाब से पानी लेकर
खड़ंजों पर मुंह और हाथ-पैर धो लिए। इसके पश्चात् हम किले के द्वार पर गए। किले के अंदर सशस्त्र सिपाही थे उन्होंने बड़ा दरवाजा खोला और हमें अंदर कर लिया। हमने संतरी से यह पूछना आरम्भ किया कि किले के अंदर जाने के लिए इजाजत लेने का क्या तरीका है। उसी समय एक सफेद दाढ़ी वाला मुसलमान पीछे से चिल्लाता हुआ आया। फ्ढेढो! (अर्थात् अछूतों) ने तालाब अपिवत्र कर दिया है। तुरंत ही किले के आसपास के सभी जवान और बूढ़े मुसलमान वहाँ आ गए और सभी ने हमें बुरा-भला कहना आरम्भ कर दिया। ढेढ़ों को अहंकार हो गया। ढेढ अपना धर्म भूल गए हैं (जैसे निम्न और स्तरहीन बने रहने)। ढेढ़ों को एक पाठ पढ़ाया जाए।य् वे बड़े उग्र हो गए। हमने उनसे कहा कि हम बाहर से आए हैं और स्थानीय रीति-रिवाज नहीं जानते हैं। वे स्थानीय अछतों पर भी बिगड़ने लगे जो तब तक फाटक तक आ गए थे। फ्तुमने इन बाहर के लोगों को क्यों नहीं बताया कि अछूत इस तालाब का इस्तेमाल नहीं कर सकते!य् वे यह प्रश्न उन बेचारों से पूछते रहे जबकि जब हम तालाब में घुसे वे वहां नहीं थे। वास्तव में यह हमारी भूल थी कि हम बिना पूछे उसमें घुस गए। वे कहने लगे कि वह उनकी गलती नहीं है। लेकिन मुसलमान मेरी बात सुनने के लिए तैयार ही नहीं थे। वे हमको और उनको भली-बुरी सुनाते रहे। उनकी बातें इतनी गन्दी थीं कि हमें उन पर क्रोध भी आ गया। हमें अपने ऊपर काबू रखना पड़ा नहीं तो बड़ी आसानी से उपद्रव हो सकता था और हत्याएं भी हो सकती थीं। हम नहीं चाहते थे कि कोई फौजदारी मामला बने और हमें अपना दौरा एकदम समाप्त करना पड़े।
भीड़ में से एक नवजवान मुसलमान यह कह रहा था कि हरेक को अपने धर्म के अनुसार चलना चाहिए, अर्थात् अछूतों को सार्वजनिक तालाब से पानी नहीं लेना चाहिए। मैं कुछ अधीर हो गया और उससे कुछ गुस्से में पूछा, फ्क्या तुम्हारा धर्म यही सिखाता है? यदि कोई अछूत मुसलमान बन जाए तो क्या तुम उसे इस तालाब से पानी लेने से रोकोगे? इन सीधे प्रश्नों से मुसलमानों पर कुछ प्रभाव पड़ा। उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया और चुपचाप खड़े रहे। सन्तरी की ओर घूरकर मैंने दोबारा गुस्से में कहा, फ्क्या हम किले के अन्दर जा सकते हैं या नहीं? हमें बताएं, यदि हम नहीं जा सकते तो हम यहाँ नहीं रुकना चाहते।य् सन्तरी ने मेरा नाम पूछा। मैंने एक कागज पर लिख दिया। वह उसे अन्दर अधीक्षक के पास ले गया और बाहर आया। हमें बताया गया कि हम किले के अन्दर जा सकते हैं। किन्तु हम कहीं भी किले के अन्दर पानी को हाथ नहीं