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डिब्बों को एक आदमी के हवाले किया गया था जिसका काम आवश्यकता पड़ने पर कार्यालय के क्लर्कों को पानी देना होता था। उसकी अनुपस्थिति में वे स्वयं भी पानी ले सकते थे और पानी पी सकते थे। मेरे मामले में यह असंभव था। मैं डिब्बों को छू नहीं सकता था क्योंकि मेरे छूने से पानी अपवित्र हो जाता। अतः मैं उस आदमी की दया पर निर्भर रहता था। मेरे प्रयोग के लिए एक जंग लगा छोटा-सा बर्तन रख दिया गया था। कोई उसे छूता नहीं था या कोई मेरे लिए उसे धोता नहीं था। लेकिन इस बर्तन में ही वह आदमी मेरे लिए पानी गिराता था। मैं पानी तभी ले सकता था जब वह आदमी हाजिर होता था। यह पानी वाला मुझे पानी देना पसन्द नहीं करता था। यह देखकर कि मैं पानी पीने आ रहा हूँ तो वह खिसक जाया करता था जिसके कारण मुझे पानी नहीं मिल पाता था। जिन दिनों मुझे पानी नहीं मिलता था वे कम नहीं थे।
मुझे आवास के मामले में भी इसी प्रकार की कठिनाई का सामना करना पड़ा। मैं बोरसाद में अजनबी था। कोई सवर्ण हिन्दू मुझे मकान देना नहीं चाहता था। हिन्दुओं के नाराज होने के डर के कारण बोरसाद का कोई अछूत मुझे ठहराने के लिए तैयार नहीं था क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि मैं वहां क्लर्क रहूं क्योंकि यह एक ऊंचा पद था। भोजन के मामले में तो और ज्यादा कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। ऐसा कोई स्थान या व्यक्ति नहीं था जिससे मैं अपना खाना ले सकता। मैं सुबह व शाम भाज़ा खरीदता था, गाँव के बाहर एकान्त में उन्हें खाता था और मामलातदार-कार्यालय के बरामदे के
खड़ंजों पर सो जाता था। इस प्रकार मैंने 4 दिन गुजारे। यह सब मेरे लिए असह्य हो गया। उसके बाद मैं जैंट्राल पर रहने गया जो मेरे पूर्वजों का गाँव था। ऐसा मैंने डेढ़ माह तक किया।
इसके पश्चात् मामलातदार ने मुझे काम सीखने के लिए एक तालाती के पास भेजा। यह तालाती तीन गाँवों जैंट्राल, खानपुर और सेजपुर का इंचार्ज था। जैंट्राल इनका हेडक्वार्टर था। मैं दो माह तक इस तालाती के साथ जैंट्राल में रहा। उसने मुझे कुछ नहीं सिखाया और मैं एक बार भी गाँव के कार्यालय में नहीं गया। खासतौर से गाँव का मुखिया नाराज था। एक बार उसने कहा था फ्अरे तुम्हारा पिता, तुम्हारा भाई भंगी है जो गाँव के कार्यालय को साफ करतं हैं और तुम कार्यालय में हमारे बराबर बैठना चाहते हो। देखो, बेहतर यही है कि तुम काम छोड़ दो।य्
एक दिन तालाती ने मुझे गाँव की जनसंख्या-सारणी तैयार करने सेजपुर बुलाया। जैंट्राल से मैं सेजपुर गया। मैंने देखा कि गाँव का मुखिया तथा तालाती गाँव के कार्यालय में कुछ काम कर रहे थे। मैं वहाँ गया और कार्यालय के दरवाजे के पास खड़ा हो गया और उनको नमस्कार किया लेकिन उन्होंने मेरी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। मैं वहाँ करीब 15 मिनट तक खड़ा रहा। मैं जीवन से पहले ही ऊब चुका था और इस प्रकार