24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
उपेक्षित तथा अपमानित होने पर मुझे गुस्सा आ गया। मैं वहाँ पड़ी एक कुर्सी पर बैठ गया। मुझे कुर्सी पर बैठा देखकर गाँव का मुखिया और तलाती मुझसे कुछ कहे बिना वहाँ से चले गए। थोड़ी देर के पश्चात् लोग आने लगे और जल्दी ही मेरे आसपास भीड़ लग गई थी। भीड़ का नेतृत्व गाँव की लाइब्रेरी का पुस्तकालयाध्यक्ष कर रहा था। मैं समझ नहीं सका कि एक पढ़ा-लिखा आदमी यह भीड़ क्यों लाया। बाद में मुझे पता चला कि कुर्सी इसकी थी। उसने मुझे बुरी तरह गाली देना शुरू किया। रावनिया (गांव का नौकर) कोंसंबोधित करते हएु उसने कहा, फ्भंगी के इस गन्दे कुत्ते को कुर्सी पर बैठने की इजाजत किसने दी?य् रावनिया ने मुझे उठा दिया और मुझसे कुर्सी छीन कर दूर ले गया। मैं जमीन पर ही बैठ गया। कुछ देर बाद भीड़ ने गांव कार्यालय में मुझे घेर लिया। क्रोधोन्मत इस भ्ीड़ में से कुछ ने मुझे भला-बुरा कहा, कुछ ने मुझे धारिया (तेज धारदार तलवार जैसे अस्त्र) से टुकड़े-टुकड़े कर देने की धमकी दी। मैंने उनसे मुझे माफ करने और मुझ पर दया करने की याचना की। इसका भीड़ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। मैं नहीं समझ रहा था कि किस प्रकार अपने आपको बचाऊं। लेकिन मेरे दिमाग में यह बात आई कि जो कुछ मेरे साथ हुआ है उसके बारे में मामलातदार को लिखूं और यह भी लिखूं कि यदि भीड़ मुझे मार देती है तो किस प्रकार मेरा संस्कार किया जाए। संयोगवश मुझे विचार आया कि यदि भीड़ को पता चल गया कि वास्तव में उनके विरुद्ध मामलातदार को सूचना दे रहा हूं तो शायद वे अपने हाथ रोक लें। मैंने रवनिया से कहा कि वह मुझे एक कागज का टुकड़ा दे जो वह दे सकता था जिस पर मैं अपने पेन से मोटे अक्षरों में निम्नलिखित लिखा सकूं ताकि सभी लोग इसे पढ़ सके।
फ्सेवा में,
मामलातदार, बोरसाद तालुका,
महोदय,
कृपया परमार कालीदास शिवराम का विनम्र नमस्कार स्वीकार करें। आपको नम्रतापूर्वक सूचित किया जाता है कि आज मेरे ऊपर मौत मंडरा रही है। मैं अपने मां-बाप की बातों की ओर ध्यान देता तो आज ऐसी स्थिति न होती। आप मेरे माता-पिता को मेरी मृत्यु की सूचना देने की कृपा करें।य्
मैंने जो कुछ लिखा था पुस्तकालयाध्यक्ष ने उसे पढ़ा और मुझे तुरन्त उसे फाड़ने के लिए कहा। मैंने ऐसा ही किया। उन्होंने मुझ पर असंख्य गालियों की बौछार कर मेरा बड़ा अपमान किया। तुम चाहते हो कि हम तुम्हें अपना तालाती कहकर पुकारें? ‘तुम एक भंगी हो और तुम कार्यालय में आकर कुर्सी पर बैठना चाहते हो?’ मैंने दया की