ब्रिटिश भारत का संविधान
1. परिचायकः विषय की सीमाएं
ब्रिटिश भारत का संविधान भारत सरकार अधिनियम 1919 नामक अधिनियम में अन्तर्विष्ट है। अतः भारत के संविधान के एक छात्र को अंग्रेजी संविधान के छात्र की तरह खोज नहीं करनी है। उसकी स्थिति अमरीकी संविधान के छात्र की स्थिति से मिलती जुलती है, जिसकी समस्या संयुक्त राज्यों के संविधान को अन्तर्विष्ट करने वाले संविधान को समझना और उसका अर्थ लगाना है। इस दृष्टि से यह प्रश्न उठाना अनावश्यक प्रतीत होता है कि संवैधानिक-विधि क्या है और सामान्यतया कौन से प्रश्न इसकी परिधि में आते हैं। दूसरे, यह मानते हुए कि संवैधानिक-विधि की सीमा में परिभाषित करना आवश्यक है, प्रश्न यह है कि क्या ऐसा प्रश्न इस विषय पर चर्चा से पहले पूछा जाए या चर्चा के अन्त में पूछा जाए। स्वर्गीय प्रोफेसर मेटलैंड ने अंग्रेजी संविधान के अध्यक्ष में बाद का तरीका अपनाया और इस तरीके के पक्ष में बहुत कुछ कहा जा सकता है। तथापि, किन्हीं कारणों से यह तरीका भारतीय संविधान का अध्ययन करने के लिए उपयुक्त नहीं होगा।
संवैधानिक-विधि क्या है यह प्रश्न प्रारम्भ में ही इसलिए उठाया जाना चाहिए कि इससे हमें यह स्पष्ट हो जाएगा कि हमारे विषय की सीमाएं क्या हैं और एक या दो उदाहरणों से ही यह स्पष्ट हो जाएगा कि उसके अन्तर्गत कौन से प्रसंग आते हैं। भारत सरकार अधिनिमय में हेवियस कार्पस रिट या मेन्डेमस रिट या सरशियोरारी रिट के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। इसमें फौजी कानून या प्रशासकीय कानून के बारे में कोई उल्लेख नहीं है। इसमें परमसत्ता के अधिकार के बारे में भी नहीं कहा गया है जिसका प्रयोग सरकार निस्संदेह भारतीय रियासतों के साथ व्यवहार में करती है। इन प्रश्नों का अध्ययन करना आवश्यक है या नहीं है? क्या भारत की संवैधानिक विधि के अध्ययन के लिए इन विषयों का अध्ययन समीचीन है या नहीं? अन्य देशों में प्राधिकारियों द्वारा जिन्होंने इन देशों की संवैधानिक विधियों का अध्ययन किया है, इन विषयों को जिस प्रकार निपटाया गया है, उनके आधार पर इसमें कोई संदेह नहीं कि सभी इस बात से सहमत हैं कि ये सभी मामले संवैधानिक-विधि के क्षेत्राधिकार में आते हैं। अतः, यदि