1. ब्रिटिश भारत का संविधान - Page 44

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इन विषयों का भारत सरकार अधिनियम में कोई उल्लेख नहीं है तो इस विषय की परिभाषा का प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

संवैधानिक-विधि क्या है, इस प्रश्न के उत्तर विभिन्न व्यक्तियों ने अलग-अलग दिए हैं। आस्टीन और मैटलैंड दो विभिन्न विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करतें हैं। ऑस्टिन ने लोक-विधि (पब्लिक लॉ) अर्थात् राजनैतिक स्थिति-विधि को दो भागों में विभाजित किया है जिनमें से एक है संवैधानिक-विधि और दूसरा प्रशासनिक-विधि। उनके अनुसार, संवैधानिक-विधि उन व्यक्तियों या व्यक्तियों के वर्गों की अवधारणा करती है जिनके पास राज्य की परमसत्ता होगी। उन्होंने बताया है कि ये लोग किस तरीके से सत्ता के भागीदार होंगे। अतः यह स्पष्ट हो जाता है कि ऑस्टिन की परिभाषा के अनुसार संवैधानिक-विधि में केवल वे नियम आते हैं जो परमसत्ता के संगठन और रचना की अवधारणा करते हैं। उनके अनुसार, संवैधानिक-विधि में वे सभी नियम नहीं आते हैं जो प्रभुसत्तात्मक संगठन की प्रभुसत्ता से सम्बन्धित हैं। जबकि ऑस्टिन ने संवैधनिक-विधि की परिभाषा को अपने सिद्धान्तों के तर्क पर निर्भर बना दिया है, मेंटलैंड ने संवैधानिक-विधि की भी सीमाओं को विवेक का विषय बना दिया है। मेंटलैंड के अनुसार, संवैधानिक-विधि में न केवल परमसत्ता की रचना के नियम सम्मिलित हैं, अपितु इसमें सर्वोच्च न्यायालय, राज्य के विभाग, राज्य के सचिव, न्यायाधीश, शान्ति-सम्बन्धी न्याय निर्धन विधि संरक्षक, स्वास्थ्य बोर्ड और पुलिस भी आते हैं। ये विचार दो परम सीमाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं और यदि आस्टिन का विचार अति संकुचित है तो निस्संदेह मेंटलैंड का विचार अति विस्तृत है।

तथपि, एक मध्यम-मार्ग भी है जो प्रोफेसर हांलैण्ड द्वारा उनके विधि संग्रह में व्यक्त विचारों पर आधारित है। अधिकार एक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति के कार्यों को राज्य की सहमति और सहायता से नियन्त्रित करने की क्षमता है। एक नागरिक द्वारा दूसरे नागरिक के विरुद्ध दिए गए अधिकार प्राइवेट विधि की विषय-वस्तु है। राज्य जिन अधिकारों का प्रयोग नागरिकों के विरुद्ध करता है और जिन अधिकारों का प्रयोग वह स्वयं के विरुद्ध करता है वे लोक-विधि के अंतर्गत आते हैं। संवैधानिक-विधि निसंदेह लोक-विधि का अंग है और इस दृष्टि से नागरिकों के विरुद्ध राज्य के अधिकार और राज्य के विरुद्ध नागरिकों के अधिकार संवैधानिक-विधि की विषय-वस्तु है। लेकिन संवैधानिक-विधि में इसके अतिरिक्त कुछ अन्य चीजें भी आती हैं। इसमें राज्य के संगठन का अध्ययन भी शामिल है क्योंकि राज्य एक कृत्रिम व्यक्ति है जिसे दण्ड देने, सम्पत्ति रखने, ठेके करने और स्वयं तथा जनता के मध्य एवं जनता में आपस के अधिकारों और कर्त्तव्यों को विनियंत्रित करने के अधिकार प्राप्त हैं। यह पूछना आवश्यक है कि इस कृत्रिम व्यक्ति का गठन किस प्रकार होता है। अतः संवैधानिक-विधि से अध्ययन में तीन चीज़ों का