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हिन्दुओं के साथ
(हस्तलिखित पांडुलिपि से उद्वत-संपादक)
यह विश्वास करना असंभव है कि हिन्दू अपने समाज में अछूतों को कभी आत्मसात कर सकेंगे। उनकी जाति-प्रथा और धर्म ऐसी आशा पर पूरी तरह पानी फेर देते हैं। फिर भी अछूतों की अपेक्षा हिन्दुओं में ऐसे असुधार्य आशावादी अधिक हैं जो यह विश्वास करते हैं कि हिन्दू अछूतों को अपने में आत्मसात कर लेंगे। इन असुधार्य आशावादियों ने सच्चे मन से राय दी है या नहीं यह एक ऐसा प्रश्न है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। कितने समय में यह आत्मसात होगा यह बताने में वे असमर्थ हैं। मान लीजिए कि आशावादी सच्चे हैं तो फिर प्रश्न ही नहीं उठता कि आत्मसात की यह प्रक्रिया लंबी होगी और कई शताब्दियों तक चलेगी। इस दौरान अछूतों को हिन्दुओं के सामाजिक और राजनैतिक नियंत्रण में रहना पड़ेगा और उन्हें वे सभी अत्याचार और जुल्म सहन करने होंगे जो वे पहले सहन करते रहे हैं। स्पष्ट है कि कोई समझदार व्यक्ति अछूतों को हिन्दुओं की इच्छा एवं प्रसन्नता पर इस आशा में नहीं छोड़ सकता कि वे अकथ्य भविष्य में उनको अपने में आत्मसात कर लेंगे। जल्दी या देर में संक्रांति काल आएगा और हिन्दुओं द्वारा उनके विरुद्ध अत्याचार तथा दमन के खिलाफ कुछ प्रावधान अवश्य किया जाना चाहिए। इस संबंध में क्या प्रावधान किए जाएँ। यदि यह प्रश्न अछूतों पर छोड़ दिया जाता है तो वे दो प्रावधान करने के लिए कहेंगे - एक संवैधानिक सुरक्षा और दूसरा पृथक उपनिवेश के लिए।
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अछूतों की रक्षा के लिए जो संवैधानिक सुरक्षा के उपाय किए जाएं वे किस प्रकार के हों, इस संबंध में अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ ने, जो भारत के अछूतों का एक राजनैतिक संगठन है, संकल्पों के रूप में कुछ सुझाव दिए हैं। संकल्प संख्या तीन और सात, जिनमें इनको परिभाषित किया गया है, नीचे दिए गए हैं।