लक्ष्य और उद्देश्य संबंधी संकल्प
सन् 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद भारत की स्वतंत्रता का मसला बहुत महत्वपूर्ण बन गया। सुचारु रुप से सत्ता हस्तांतरण के तरीके और उपाय सुझाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने तीन सदस्यीय शिष्टमंडल भारत भेजा। उस शिष्टमंडल को केबिनेट मिशन कहते थे। उसने 16 मार्च, 1946 को अपने प्रस्तावों की घोषणा की जिनमें सुझाव दिया गया कि भारत के भावी शासन के लिए संविधान निर्माण के लिए एक संविधान सभा का गठन किया जाए।
तद्नुसार संविधान सभा के लिए निर्वाचन किए गए, जिनमें प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा सदस्य निर्वाचित किए गए। कांग्रेस विरोध की वजह से डॉ. अम्बेडकर मुम्बई से नहीं चुने जा सके। फिर भी वैसे योगेंद्र नाथ मंडल और अन्य अनुसूचित जाति के सदस्यों के समर्थन से बंगाल विधानसभा से संविधान सभा के सदस्य बन गये।
संविधान सभा ने स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण का काम 9 दिसम्बर, 1946 को शुरु कर दिया। कुल मिलाकर 296 सदस्य उद्घाटन सत्र में भाग लेने के हकदार थे, किन्तु 207 ने ही उसमें भाग लिया। मुख्यतः मुस्लिम लीग के सदस्य अनुपस्थित रहे क्योंकि उन्होंने संविधन सभा का बहिष्कार कर दिया था।
भारत की संविधान सभा का प्रथम अधिवेशन संविधान कक्ष, नई दिल्ली में सोमवार 9 दिसम्बर, 1946 को प्रातः 11 बजे आरंभ हुआ।
आचार्य जे.बी. कृपलानी ने डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा से अनुरोध किया कि वे अस्थायी सभापति के पद पर आसीन हों। सभापति ने सदन में उद्घाटन भाषण दिया। इसके बाद फ्रेंक एंथनी को उपसभापति मनोनीत किया गया।
इसके पश्चात् सदस्यों ने अपने परिचय पत्र प्रस्तुत किए और रजिस्टर में अपने हस्ताक्षर किये। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने बंगाल के सदस्य के रुप में हस्ताक्षर किये। संविधान सभा ने 10 दिसम्बर, 1946 को संविधान सभा के सभापति के निर्वाचन के लिए नियम पारित किए। तत्पश्चात् सभा ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को 11 दिसम्बर, 1946 को सभा के स्थायी सभापति के रुप में निर्वाचित किया।