अध्याय 7 - राज्यों के उच्च न्यायालय - Page 229

210 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

(2) जहां अधिकारिता का विस्तार किया जाना है वहां उस

राज्य की सम्मत्ति भी जिसमें उच्च न्यायालय की प्रधान

पीठ है, प्राप्त न कर ली गई हो।

किसी राज्य में 208. जहां कोई न्यायालय उस राज्य के बाहर जिसमें उच्च उच्च न्यायालय न्यायालय की प्रधान पीठ स्थित है, किसी क्षेत्र के संबंध की अधिकारिता में अधिकारिता का प्रयोग करता है वहां इस संविधान का के संबंध में, किसी भी बात का अर्थ यह नहीं लगाया जाएगा कि जिसकी अधिकारिता वह-

उस राज्य के (क) उस राज्य के विधानमंडल को जिसमें न्यायालय की प्रधान बाहर तक है, पीठ स्थित है, उस अधिकारिता में अभिवृद्धि करने, उसे राज्यों के विधान निबंधित करने या समाप्त करने के लिए सशक्त करती है_ मंडलों की (ख) पहली अनुसूची के भाग 1 या भाग 3 में तत्समय शक्ति पर निर्बंधन विनिर्दिष्ट किसी राज्य के विधानमंडल को जिसमें ऐसा

कोई क्षेत्र स्थित है, उस अधिकारिता को समाप्त करने के

लिए सशक्त करती है_ अथवा

(ग) ऐसे किसी क्षेत्र के लिए, इस निमित्त, विधियां बनाने की

शक्ति रखने वाले विधानमंडल को, इस अनुच्छेद के खंड

(ख) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उस क्षेत्र के संबंध में

न्यायालय की अधिकारिता की बाबत ऐसी विधियां पारित

करने के लिए सक्षम होगा यदि न्यायालय की प्रधान पीठ

उस क्षेत्र में हो।

निर्वचन 209. जहां कोई उच्च न्यायालय एक से अधिक राज्यों के संबंध

में या एक राज्य और ऐसे क्षेत्र के संबंध में, जो राज्य का

अंग नहीं है, अधिकारिता का प्रयोग करता है वहां-

(क) इस अध्याय में किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के

संबंध में राज्यपाल के प्रति निर्देश का अर्थ उस राज्य के

राज्यपाल के निर्देश के रुप में किया जाएगा जिसमें ऐसे

न्यायालय की प्रधान पीठ है।

(ख) अधीनस्थ न्यायालयों के लिए नियमों, प्रारुपों और सारणियों

के राज्यपाल द्वारा अनुमोदन के प्रति निर्देश का अर्थ उस

राज्य के राज्यपाल या शासक द्वारा जिसमें वह अधीनस्थ

न्यायालय स्थित है, उसके अनुमोदन के प्रति निर्देश के