परिशिष्ट
श्री अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर, सदस्य, प्रारुपण समिति द्वारा संविधान सभा को प्रस्तुत प्रथम टिप्पणी-
मैं यह कहना चाहूँगा कि यद्यपि संसद और इकाइयों के बीच विधायी शक्ति के वितरण के बारे में या प्रांतीय (राज्य) सूची के विषय की बाबत उस समय संघ संसद द्वारा शक्ति ग्रहण के बारे में जब वह विषय राष्ट्रीय महत्व का हो जाए, मेरे साथियों और मेरे बीच सिद्धांत कोई अंतर नहीं है फिर भी उपरोक्त विषयों से संबंधित अनुच्छेदों अर्थात् अनुच्छेद 217, 323(1) और 226 के बारे में संविधान सभा के विचारार्थ निम्नलिखित प्रथम टिप्पणी प्रस्तुत करना चाहता हूँ।
विधायी शक्तियों का विवरणः अनुच्छेद 217 और 223 (1)
- विधायी शक्ति के वितरण का प्रश्न संविधान सभा द्वारा विनिश्चित हो चुका
है और यह स्थित है कि अवशिष्ट शक्ति केन्द्र में निहित होनी चाहिए। अतः
एकमात्र प्रश्न यह है कि उन अनुच्छेदों की रचना कैसे की जाए ताकि इस
विचार को कार्यान्वित किया जा सके। मेरे साथियों ने भारत शासन अधिनियम की
धारा 10 की स्कीम का अनुसरण करने का तथा अवशिष्ट शक्ति के लिए प्रथम
अनुच्छेद रखने का एवं संघ को आवंटित विषयों की सूची में एक मद के रुप
में रखने का विनिश्चय किया है मेरी योजना है कि चूंकि इस पर सहमति है कि
अवशिष्ट शक्ति के दृष्टांत स्वरुप हैं। अतः उचित योजना यह है कि पहले तो
राज्य या प्रांतीय इकाइयों की शक्तियों को परिनिश्चित किया जाए, फिर समवर्ती
शक्ति का उल्लेख किया जाए और अंत में केन्द्र या संघ संसद की शक्ति का।
साथ ही साधारण शक्ति के दृष्टांत के रुप में केन्द्र में निहित शक्तियों की वृहद्
सूची बनाई जाए। भारत शासन अधिनियम की धारा 10 में अपनाई गई योजना
कुछ हद तक इस तथ्य के कारण थी कि अवशिष्ट शक्ति के स्थान के बारे में
उस समय राजनैतिक दलों में कोई सहमति नही थी और यह विनिश्चिय करने
का काम गवर्नर जनरल पर छोड़ दिया गया था कि जो विषय किसी भी सूची
में नहीं आते उनके बारे में कौन-सा विधानमंडल किसी खास स्थान में अवशिष्ट
शक्ति का प्रयोग करे। अब हमारे सामने ऐसी कोई समस्या नहीं है। केन्द्र सूची