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की अलग-अलग मदों के अर्थ और तात्पर्य का प्रचार भारत शासन अधिनियम

के उपबंधों के अधीन होने की अपेक्षा अब बहुत कम महत्व का रह गया है।

धारा 100 के प्रत्येक खंड में ‘‘के होते हुए भी’’ की पुनरावृति न्यायालयों में

लम्बी और अनावश्यक बहस का विषय रही है।

भाग 3 की रियायतों के संघ की स्कीम के अंतर्गत आने के फलस्वरुप कोई जटिलता

होनी संभाव्य नहीं है क्योंकि प्रारुप संविधान के अनुसार वितरण की स्कीम राज्यों

में सहमति के अधीन है और वह अनुच्छेद 224 और 25 द्वारा उपबंधित है।

इसके अतिरिक्त, विरचित अनुच्छेदों में इस आशय का कोई उपबंध नहीं है कि विधायन की शक्ति के साथ-साथ विधायी प्राधिकार के कारगर प्रयोग के लिए अनिवार्य कोई उपबंध करने की शक्ति भी है। ऐसे कुछ उपबंध आस्ट्रेलियाई और अमेरिकी संविधानों में आस्ट्रेलियाई संविधान की धारा 51 और अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद 1 धारा (8), उपधारा (18) के रुप में है।

अतः, मैं प्रारुप के अनुच्छेद 217 और 223(1) के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद संविधान सभा के विचारार्थ सुझाता हूँ।

(1) भाग 1 अनुसूची 1 के राज्यों के विधानमंडल को सूची 1 (प्रांतीय विधायी सूची

की तत्स्थानी) विनिर्दिष्ट विषयों के वर्गों के साथ आने वाले विषयों के संबंध में

राज्य या उसके किसी भाग क लिए विधियां बनाने की अनन्य शक्ति होगी।

(2) भाग 1 अनुसूची 1 के राज्यों में से किसी राज्य के विधानमंडल के खंड (1)

की शक्तियों के साथ-साथ, सूची 2 में विनिर्दिष्ट विषयों के वर्गो के अंतर्गत आने

वाले विषयों के संबंध में राज्य या उसके किसी भाग के लिए विधियां बनाने

की शक्ति होगी, परंतु फिर भी संघ संसद को भी संघ के संपूर्ण क्षेत्र या उसके

किसी भाग के अंदर उन्हीं विषयों के संबंध में विधियां बनाने की शक्ति होगी,

और राज्य के विधानमंडल के अधिनियम राज्य में या के लिए तभी तक प्रभावी

रहेगा जब तक यह संघ संसद के किसी अधिनियम के विरुद्ध नहीं है।

(3) पूर्व उपधारा द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अतिरिक्त संघ संसद भाग 1 में अंकित

विषयों के वर्गों के अंतर्गत न आने वाले सभी विषयों की बाबत संघ या उसके

किसी भाग में शांति, व्यवस्था और सुशासन के लिए विधियां बना सकेगी और

विशिष्टतया और पूर्वगामी की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना संघ

संसद को सूची 3 में अंकित विषयों के वर्गों के अंतर्गत आने वाले सभी विषयों

के संबंध में विधियां बनाने की अनन्य शक्ति होगी।