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वह राष्ट्रीय आयाम का हो गया है। यदि ये आधार वाक्य सही है जो राज्य के लिए उस शक्ति को रखे रखने का कोई औचित्य नहीं होगा। संघ द्वारा उस शक्ति को ग्रहण करने का उद्देश्य, प्रांतीय या राज्य शक्ति को समवर्ती शक्ति में बदलने के लिए संविधान में परिवर्तन का सहारा लिए बिना किसी सादा या सरल पद्धति के रुप में नहीं है। इस सिद्धांत को अनुच्छेद 228 में ध्यान में नहीं रखा गया है। इसमें उपबंधित है कि उस विषय में प्राप्त की शक्ति बनी रहेगी। प्रांतीय शक्ति को समवर्ती शक्ति में बदलने से केन्द्र द्वारा हस्तक्षेप को अधिमान मिल जाएगा और अंततः संविधान के संघात्मक ढांचे पर कुठाराघात हो सकता है। अतः मैं निम्नलिखित शब्दों के प्रति स्थापन का सुझाव दूँगा।
‘‘इस आधार पर कि राज्य सूची में प्रमाणित किसी विषय ने राष्ट्रीय महत्व ग्रहण कर लिया है ‘‘शब्द’’ या राष्ट्रीय हित में समीचीन ........................संकल्प ‘‘शब्दों के स्थान पर रखे जाएं और ‘‘संसद ऐसे विषय के संबंध में विधियां बनाएं’’ शब्द जोड़े जाएं।
अनुच्छेद 228 में ‘‘अनुच्छेद 226 और 227 की कोई बात’’ शब्द ‘अनुच्छेद 227 की किसी बात’ शब्दों के स्थान पर रखे जाएं।
-अल्लादी कृष्णास्वामी
अनुच्छेद 218 अनावश्यक है, क्योंकि यह उच्चतम न्यायालय के विषय में है जो सूची 1के मद है।
अनुच्छेद 221 उच्च न्यायालय के विषय में है। अधिकारिता के लिए विशेष रुप से उपबंध करने की कोई तुक नहीं है क्योंकि अधिकारिता उच्च न्यायालय समेत सभी न्यायालयों की अधिकारिता 3 सूचियों में अधिकारिता विषयक मद के अंतर्गत आ जाती है। चूंकि विधायी शक्ति के वितरण से संबंधित में सूचियों के प्रति निर्देश है, इसलिए उच्चतम न्यायालय के विषय में एक पृथक अनुच्छेद फालतू और अनावश्यक है।
अल्लादी कृष्णास्वामी
आदेश से
एच. वी. आर. अय्यंगर
सचिव
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