336 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
(4) (क) संघ संसद का भाग 2 अनुसूची 1 के राज्यों में शांति, व्यवस्था और
सुशासन के लिए विधियां बनाने की शक्ति होगी।
(ख) उपधारा (क) के अधीन संसद की साधारण शक्तियों के अधीन रहते हुए भाग 2 अनुसूची 1 के राज्यों के विधानमंडल को निम्नलिखित विषय-वर्गों के अंतर्गत आने वाले विषयों के संबंध में विधियां बनाने को शक्ति होगीः
परंतु फिर भी उस ईकाई द्वारा पारित कोई विधि उस ईकाई में और के लिए तभी तक प्रभावी होगी जब तक और जहां तक वह संसद की किसी विधि के विरुद्ध नहीं है। (यह उपबंध आवश्यक है, यदि मुख्य आयुक्त प्रांतों पर तदर्थ समिति की इस बाबत सिफारिशें स्वीकार कर ली जाती है।)
(5) संघ संसद की या किसी राज्य के विधानमंडल का विधान बनाने की शक्ति
का विस्तार उन सब विषयों पर होगा जो उसे विधानमंडल विशेष में निहित
विधायी प्राधिकार के कारगर प्रयोग के लिए आवश्यक है।
(6) जहां राज्य की विधि संघ संसद की विधि के या सूची 1 या (सूची 2) में
प्रमाणित विषयों में किसी विषय की बाबत किसी वर्तमान विधि से असंगत
है वहां यथास्थिति संसद की विधि या वर्तमान विधि अभिभावी होगी और
राज्य की विधि विरुद्धता की सीमा तक शून्य होगी।
(यह आस्ट्रेलियाई और अमेरीकी संविधानों के अनुसरण में है। अनेक धारा और प्रत्येक
खंड की परीक्षा किए बिना न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता है कि अधिनियम समग्र रुप में किसी दूसरी विधि के विरुद्ध है)
यदि आवश्यक समझा जाए तो समवर्ती सूची के विषयों से संबंधित विधियों के बारे में, अनुच्छेद 231(2) के अनुरुप अंतःस्थापित किया जा सकेगा यद्यपि मैं समझता हूँ कि ऐसा उपबंध केन्द्रीय विधानमंडल की अध्यारोही शक्ति की दृष्टि से आवश्यक नहीं है।
अनुच्छेद 226 और 228
- मैं अनुच्छेद 226 में अंतनिर्हित सिद्धांत को स्वीकार करता हूँ कि यदि प्रांतीय सूची का कोई विषय राष्ट्रीय महत्व ग्रहण कर लेता है या अनुच्छेद की भाषा में राष्ट्रीय हित का बन जाता है तो संघ के लिए प्रांतीय क्षेत्र पर अतिक्रमण (यदि इस पद का प्रयोग किया जा सके तो) कहना एवं प्रांतीय सूची के किसी विषय पर विधान बनाने की शक्ति अपने हाथ में लेना संभव होना चाहिए। किन्तु उस शक्ति के ग्रहण करने का आधार यही है कि उस विषय को अब केवल राज्य विशेष की महत्ता का ही न माना जाए बल्कि