44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
पारित कर दे कि शासकीय प्रारुपकार इन सब संशोधनों को ध्यान में रखे और जहां कहीं वह आवश्यक समझें उनका समावेश करें। यदि हम संशोधनों को एक-एक करके लेंगे तो एक दिन से भी ज्यादा समय लग जाएगा। आखिरकार अलग-अलग लोग एक ही विचार को व्यक्त करने के लिए भिन्न भाषा इस्तेमाल करते हैं अतः इसे प्रारुपकारों पर छोड़ना बेहतर होगा। वे एक आम आदमी की अपेक्षा इस विषय में विशेष रूप से निपुण होते हैं। आम आदमी इस विषय में केवल अपने समय का प्रयोग करना चाहते हैं।
¹नियम 38-ख अंगीकार किया गया-संपादकह्
¹प्रारुपण समिति की पहली बैठक 30 अगस्त, 1947 को हुई और उसने डॉ. अम्बेडकर को सर्वसम्मति से अपना सभापति चुना। तारीख 27 अक्तूबर, 1947 से समिति की बैठकें हर रोज की गईं जिनमें सांविधनिक सलाहकार के कार्यालय द्वारा प्रारुप के अनुच्छेदों पर विचार-विमर्श किया गया और उनका पुनरीक्षण किया गया। कुल मिलाकर 13 फरवरी, 1948 तक 44 दिनों में समिति की 44 बैठकें हुईं। आगे उन सब में स्वयं डॉ. अम्बेडकर ने सारे कार्य का संचालन किया। प्रारुपण समिति द्वारा तैयार किया गया संविधान का नया प्रारुप 21 फरवरी, 1948 को सभा के सभापति को प्रस्तुत किया गया। समिति कार्य करती रही और समय-समय पर किए गए संशोधनों के सुझावों पर विचार-विमर्श किया गया। प्रारुप संविधान सभा के समक्ष चर्चा के लिए 4 नवम्बर, 1948 को पेश हुआ-संपादक।ह्
*****