प्रारुप संविधान का प्रथम वाचन - Page 65

46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

प्रारुप संविधान का प्रथम वाचन

भारत की संविधान सभा की बैठक कांस्टिट्यूशन हाल, नई दिल्ली में बृहस्पतिवार अर्थात् 4 नवम्बर, 1948 को हुई।

प्रत्यय पत्र प्रस्तुत करने, रजिस्टर पर हस्ताक्षर करने तथा शपथ लेने की औपचारिकताएं पूरी किए जाने के बाद सभापति माननीय डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सदस्यों से कहा कि वे अपनी सीटों से उठकर राष्ट्रपिता को श्रद्धासुमन अर्पित करें। उन्होंने गांधी को ऐसा व्यक्ति बताया जिन्होंने हमारी निर्जीव हड्डियों और मांस में प्राण डाले, जिन्होंने हमें निराशा के अंधेरे से बाहर निकाल कर आशा और उपलब्धि की रौशनी दिखाई और जिन्होंने हमें गुलामी से मुक्त कराकर आजादी का मार्ग दिखाया।

सदस्यगण मौन धारण कर खड़े हो गए।

इसके बाद, अपनी-अपनी जगह मौन खड़े होकर सदस्यों ने कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना, श्री डी.पी. खैतान और श्री डी.एस. गुरंग के प्रति भी शोक व्यक्त किया।

सभा ने सबसे पहले मद्रास की समस्या श्रीमती दुर्गाबाई के प्रस्ताव पर चर्चा की। वह संविधान सभा नियम 5क और 5ख का संशोधन था। वह सदन द्वारा स्वीकार कर लिया गया।

इसके बाद सभापति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने खड़े होकर सदन को संबोधित किया। उन्होंने बताया कि आगे का कार्यक्रम क्या होगा। इसके बाद चर्चा हुई।

दोपहर बाद के सत्र में सभापति ने डॉ. अम्बेडकर से अपना प्रस्ताव रखने के लिए कहा। तद्नुसार डॉ. अम्बेडकर ने प्रारुप संविधान सभा में विचारार्थ रखा।

प्रारुप संविधान के संविधान सभा में 4 नवम्बर, 1948 को पेश हो जाने के बाद संक्षिप्त व साधारण चर्चा हुई जिसे संविधान का प्रथम वाचन कहते हैं। दूसरा वाचन 15 नवम्बर, 1948 को प्रारंभ हुआ। दूसरे वाचन में संविधान पर विस्तार से खण्ड-दर-खण्ड चर्चा हुई। यह चर्चा 17 अक्तूबर, 1949 को समाप्त हुई।

संविधान सभा का अधिवेशन पुनः 14 नवम्बर, 1949 को तीसरे वाचन के लिए हुआ। यह 26 नवम्बर, 1949 को समाप्त हुआ तब संविधान को पारित घोषित किया गया और उसके बाद सभापति ने उस पर हस्ताक्षर किए।

इस भाग में प्रारुप संविधान को उपबंध के रूप में रखा गया हैं। इससे पाठकों को मूल अनुच्छेदों के उल्लेख से इसके खण्डों और उन पर हुई चर्चा को समझने में मदद मिलेगी।

-संपादक