2 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
(i) कि नागरिकों को, पुरुषों और स्त्रियों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त
साधन का अधिकार हो_
(ii) कि समाज के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व व नियंत्रण का इस प्रकार
वितरण हो जिससे कि वे सभी के लिए उपयोगी हों_
(iii) कि आर्थिक तंत्र के संचालन से सम्पत्ति तथा उत्पादन के साधनों का
संकेन्द्रीकरण न हो, जिससे सभी का नुकसान होता हो_
(iv) कि पुरुषों तथा स्त्रियों दोनों ही के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन हो_
लगभग इसी प्रकार की कुछ अन्य बातें हैं। प्रो. शाह से मैं यह पूछना चाहता हूँ -
यदि ये निर्देशात्मक सिद्धांत जिनकी ओर मैंने ध्यान आकर्षित किया है, की दिशा और विषयवस्तु समाजवादी नहीं है तो मैं यह समझने में असफल हूँ कि इससे अधिक समाजवाद और क्या हो सकता है?
इसलिए मेरा कहना है कि ये समाजवादी सिद्धांत संविधान में पहले ही प्रस्तुत किए जा चुके हैं और इस संशोधन को स्वीकार करना अनावश्यक है।
ऽ ऽ ऽ ऽ
¹प्रो. के.टी. शाह का संशोधन जैसा अधोलिखित है, पर लिया गया।ह्
ऽ श्रीमान् उपाध्यक्षः प्रश्न है-
फ्कि अनुच्छेद 1 की धारा (1) में ‘होगा’ शब्द के पहले ‘निरपेक्ष धर्म, संघीय, समाजवाद’ शब्दों को अन्तर्विष्ट किया जाए।य्
प्रस्ताव अस्वीकृत हो गया।
श्रीमान् उपाध्यक्ष- मैं एक बात स्पष्ट करना चाहता हूँ। डॉ. अम्बेडकर द्वारा उत्तर दे देने के पश्चात ् मैं चर्चा को आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दूँगा। मैं यह भूल एक बार कर चुका हूँ। मैं इसे दोहराऊँगा नहीं। (हँसी)
महबूब अली बेग साहिब बहादुर (मद्रास - मुसलमान) ः श्रीमान ् उपाध्यक्ष महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँ -
फ्कि अनुच्छेद 1 की धारा (1) में ‘राज्यों’ शब्द के स्थान पर ‘प्रांतों’ शब्द को प्रतिस्थापित किया जाए।य्
ऽ सी.ए.डी. अंक VII, 15 नवम्बर, 1948, पृ. 403