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* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमान, मैं प्रस्तावित करता हूँ :
“कि तीसरी अनुसूची में घोषणा के प्रारूप VI के गवर्नर द्वारा अपने विवेकाधिकार का निर्वहन किए जा रहे कर्त्तव्यों के किसी मामले में खासतौर से आज्ञा दिये जाने पर’’ शब्द हटा दिए जाएं।
यह आवश्यक है क्योंकि हम गर्वनर के पास बिल्कुल भी विवेकाधिकार नहीं छोड़ना चाहते।
श्री एच. वी. कामथ : क्या मैं डॉ. अम्बेडकर को याद दिलाऊं कि 143 अभी तक संशोधित नहीं हुआ है। माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : हाँ, वह मुझे याद है।
माननीय सभापति : हमने सभी विवेकाधिकार निर्णय समाप्त कर दिए हैं।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : प्रारूप VI के अन्त में आई वाक्य-रचना के सम्बन्ध में श्री नजीरुद्दीन अहमद : प्रारूप
कठिनाई उत्पन्न होती है।
माननीय सभापति : इसी कारण डॉ. अम्बेडकर ने इसके हटाने का प्रस्ताव रखा है।
** माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : इस संशोधन के प्रस्तावित करने में कुछ सदस्यों की भावनाओं को अप्रसन्न करने की तनिक भी इच्छा नहीं थी जिन्होंने ’ईश्वर’ को पंक्ति के नीचे रखे जाने के आधार पर मसौदे के विरुद्ध बयान दिए। श्रीमन, इस मामले में मुझे स्वीकार करना चाहिए कि वास्तव में हमारी कोई सदृश नीति नहीं है जिसे हमने माना हो, उदाहरण के लिए अनुच्छेद 49 जो पारित किया जा चुका है। मैं सोचता हूँ ईश्वर को पंक्ति के ऊपर रखा गया होता और सत्यनिष्ठा को पंक्ति के नीचे। अनुच्छेद 81 में हमने सत्यनिष्ठा को पहले रखा है और शपथ को उसके पश्चात्। इस अनुच्छेद में जिसके लिए हमने संशोधन रखे हैं हमने मुख्य खण्ड की भाषा को माना है जो इस प्रकार है ’ सत्यनिष्ठा अथवा शपथ’। प्रमुख खण्ड की भाषा होने के कारण तर्क पूर्ण यह था कि सत्यनिष्ठा को पंक्ति के ऊपर रखा गया और शपथ को नीचे। यह निपट तार्किक बात है। अब वह कारण, कि हमने सत्यनिष्ठा को पहले रखना क्यों वांछनीय समझा और शपथ को बाद में, यह था कि इस देश में एक हिन्दू को जब गवाही देने के लिए अदालत में पुकारा जाता है तो आम तौर से सत्यनिष्ठा से आरंभ होता है। केवल ईसाई, एंग्लोइंडियन और मुसलमान ही शपथ
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 26 अगस्त, 1949, पृ. 711-712
** ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 26 अगस्त, 1949, पृ. 711-712