148 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
लेते हैं। हिन्दू ईश्वर का नाम लेना/उच्चारण करना पसंन्द नहीं करते। इसलिए मैंने सोचा कि इस प्रकार के मामले में हमें बहुसंख्यकों की भावनाओं और व्यवहार का आदर करना चाहिए और परिणामस्वरूप हमने सत्यनिष्ठा और शपथ की स्थिति बताने के लिए इस विशेष प्रकार के तरीके को अपनाया। जैसा मैंने कहा, मेरा न तो यह विचार है और न वह। मैं सदन की इच्छाओं को अपनाने के लिए पूर्णतः तत्पर हूँ। यदि सदन का विचार है कि श्री कामथ का संशोधन अपनाया जाए और मैं निवेदन करता हूँ कि जहाँ तक हिन्दुओं का संबंध है जो व्यवहार इस देश में चल रहा है उसके यह विपरीत होगा तब मैं जो सुझाव देता हूँ वह यह है कि इस स्तर पर मेरे ही संशोधनों को इस स्वतंत्रता के साथ इजाजत मिलेगी कि प्रारूपण समिति उन सभी अनुच्छेदों पर विचार करेगी जो इस संविधान में सम्पूर्ण मामले को ठीक करने के लिए हटा गये है। यहाँ इनको बदलना और अन्य अनुच्छेदों को जैसे हैं वैसे ही छोड़ना उचित नहीं होगा।
श्री महावीर त्यागी : ईश्वर के रास्ते में व्याकरण को मत आने दो।
श्री एच. वी. कामथ : अनुच्छेद 81 के बारे में सदन के सम्मुख कोई संशोधन नहीं था। यह कहा गया था कि प्रत्येक सदस्य को संसद के प्रत्येक सदन में तीसरी अनुसूची के अनुसार सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञा करेगा और ईश्वर की शपथ लेगा। लेकिन सदन ने अबतक जो स्वीकार किया है वह राष्ट्रपति तथा राज्यपाल के लिए शपथ अथवा सत्यनिष्ठा है और, वह उस नमूने में है जिसे मैंने आज अपने संशोधन में रखा है।
माननीय सभापति : इस विषय पर बहस करना आवश्यक नहीं है बेहतर होगा कि आप इस पर मतदान करा लें। यह वह प्रश्न नहीं है जिसपर बहस करने की बहुत गुंजाइश हो। जैसा डॉ. अम्बेडकर ने कहा है, उनके मन में कोई विशेष भावना नहीं है और यदि सदन कोई एक रास्ता तय कराता है, तो वह सभी अनुच्छेदों को उस प्रारूप में रखने की स्वतंत्रता मांगेंगे। इसलिए मैं संशोधन को मत के लिए रखूंगा।
श्री नजरुद्दीन अहमद : मेरे संशोधनों को डॉ. अम्बेडकर ने छुआ तक नहीं है।
माननीय सभापति - यह अलग (बात) है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : ‘निष्ठापूर्वक’ शब्द के बाद ? “निष्ठापूर्वक“
| vE | csMd | j |
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शब्द के पश्चात् मैं इससे कुछ अधिक जोड़ना चाहूँगा। यह काफी नहीं होगा।
माननीय सभापति : वह “स्नेह“ शब्द को हटाना चाहते हैं।
(कुछ रूककर)
अच्छा, मैं संशोधन लूंगा।
(निम्न संशोधन अंगीकार किया गया।)