प्रविष्टि 12 - Page 180

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मित्र श्री त्यागी को गृहवास सुविधा विषयक शक्तियों से मौलिक एतराज नहीं है, तो मैं सोचता हूँ उन्हें नियंत्रण अंतरण से भी कोई एतराज नहीं होना चाहिए।

माननीय सभापति : मैं अब संशोधन को मत के लिए रखूंगा। पहला डॉ. देशमुख का है।

डॉ. पी.एस. देशमुख : मुझे संतोष होगा यदि प्रारूपण समिति अंतिम मसौदे के समय विचार करना ठीक समझे।

माननीय सभापति : जहाँ तक मैं देखता हूँ यह मात्र प्रारूपण का मामला है। इसलिए इसे हमें प्रारूपण समिति के लिए छोड़ देना चाहिए।

(संशोधन अस्वीकार किया गया।)

[ केवल डॉ. अम्बेडकर का संशोधन स्वीकार किया गया। प्रविष्टि 7 यथा संशोधित संघ सूची में जोड़ी गई। ]

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* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमन, यहाँ बहुत से विचार हैं जो इस संशोधन

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के बारे में हैं। जैसा मेरे मित्र श्री कामथ देखेंगे, यह केवल प्रविष्टि नहीं है जो विदेशी राष्ट्रों से संबंध रखती है। प्रथम स्थान पर यह एक प्रविष्टि है जिसे विदेशी कार्य कहा जाता है जो इस देश द्वारा कार्य करने के लिए बहुत विस्तृत है यदि यह किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन के सदस्य के रूप में स्थापित करने की इच्छा करती है। यहाँ एक अगली प्रविष्टि भी है जिस पर हम इस समय चर्चा कर रहे हैं जो किसी अंतर्राष्ट्रीय सभा अथवा किसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था में भाग लेने संबंधी विधान की आज्ञा देती है। इस दृष्टि से मुझे सोचना चाहिए था कि जिस प्रकार का संशोधन मेरे मित्र श्री कामथ ने पेश किया है वह वास्तव में अनावश्यक है। दूसरे, यह याद रखना चाहिए कि यह मात्र विधायी प्रविष्टि है। यह राज्य को सूची I में सम्मिलित प्रविष्टि के बारे में विधान बनाने के लिए समर्थ नही बनाती है। यदि प्रारूप संविधान के मध्य में कोई अनुच्छेद था जिसने राज्य की विधायी शक्तियां सीमित की थीं जो इनमें से किसी प्रविष्टि द्वारा दी गई थी तो जो प्रश्न मेरे आदरणीय मित्र श्री कामथ द्वारा उठाया गया था उचित है, लेकिन मुझे नहीं दिखाई देता कि संविधान में सीमित करने वाला कोई अनुच्छेद है जो संयुक्त राष्ट्र संगठन की सदस्यता को इस प्रविष्टि द्वारा दी गई विधायी शक्तियां सीमित करती है और अनुच्छेद में बिल्कुल भी ऐसी प्रविष्टि नहीं है। इसलिए राज्य

* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 29 अगस्त, 1949, पृ. 743