नया अनुच्छेद 79 अ - Page 23

2 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सरकार तथा सभाध्यक्ष के बीच उस समय से ही विवाद का विषय है जब स्वर्गीय विट्ठलभाई पटेल से सभा के अध्यक्ष की कुर्सी संभालने का अनुरोध किया गया था। कार्यकारी सरकार तथा सभाध्यक्ष के बीच विवाद जारी रहा था। अध्यक्ष ने मत प्रकट किया था कि सभा का सचिवालय कार्यकारी सरकार पर निर्भर नहीं होना चाहिए। दूसरी तरफ तत्कालीन कार्यकारी सरकार का यह मत था कि कार्यपालिका को अध्यक्ष की इच्छाओं तथा नियंत्रण की परवाह न करते हुए विधानसभा के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु कार्मिकों व स्टाफ की नियुक्ति का अधिकार है। अन्ततः कार्यकारी सरकार ने 1928 या 1929 में विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष समर्पण कर दिया और तत्कालीन अध्यक्ष का मत स्वीकार कर विधानसभा के लिए एक आत्मनिर्भर सचिवालय बना दिया। इसलिए, जहाँ तक केन्द्रीय सभा का सम्बन्ध है वहाँ अनुच्छेद 79अ से वास्तव में कोई बदलाव प्रभावी नहीं होगा, क्योंकि अनुच्छेद 79अ की धारा (1) में यह एक विद्यमान तथ्य है।

परन्तु, यह ध्यान दिलाया गया कि यह प्रक्रिया जो कि केन्द्रीय विधानपालिका द्वारा 1928 या 1929 में अपनायी गयी है उसका विभिन्न प्रांतीय विधानपालिकाओं द्वारा अनुकरण नहीं किया जाता है। कुछ प्रांतों में यह रिवाज अब तक जारी है जिसके अन्तर्गत एक अधिकारी, जो कि विधानपालिका विभाग के अनुशासनात्मक न्यायक्षेत्र के अधीन होता है और जो विधानसभा के सचिव के रूप में कार्य करता है, नियुक्त किया जाता है। परिणामस्वरूप, उस अधिकारी पर दोहरा नियंत्रण होता है, विभाग का नियंत्रण, जिसका वह अधिकारी है और अध्यक्ष का नियंत्रण, जिसके नीचे वह उस समय सेवारत है। यह मत व्यक्त किया जाता है कि यह अध्यक्ष की गरिमा और विधानसभा की स्वतंत्रता के लिए अपमानजनक है।

अध्यक्षों के सम्मेलन में विभिन्न प्रस्ताव यह आग्रह करते हुए प्रस्तुत किए गए कि संविधान में इस व्यवस्था के अतिरिक्त और कई व्यवस्थायें की जानी चाहिएं जिससे कि संख्या, नियुक्ति, सेवा की शर्तों इत्यादि को नियमित किया जा सके। प्रारूपण समिति अध्यक्षों के सम्मेलन में उठाये गये अन्य विवादों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। उनका विचार था कि यह पर्याप्त होगा यदि संविधान में एक सरल धारा हो, जिसमें यह कहा गया हो कि संसद के पास अलग से सचिवालयी स्टाफ होना चाहिए और शेष मामले संसद द्वारा नियमित किए जाने के लिए छोड़ देने चाहिए। धारा (3) में व्यवस्था है कि जब तक संसद द्वारा कोई व्यवस्था नहीं की जाती, राष्ट्रपति लोकसभा के अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति के साथ परामर्श कर भर्ती और सेवा की शर्तों के सम्बन्ध में नियम बना सकता है। जब संसद कानून बनाती है तो वह कानून राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति के साथ परामर्श कर बनाये गये अस्थायी नियम की अवहेलना करेगा। मेरा विचार है