4 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अनुच्छेद 104
* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँ :
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कि अनुच्छेद 104 के लिए, अधोलिखित अनुच्छेद प्रतिस्थापित किया जाय :
न्यायाधीशों के “104. (1) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को उतना वेतन दिया
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वेतन आदि जायेगा जितने के लिए द्वितीय अनुसूची में विशेष रूप से इसका
उल्लेख है।
(2) प्रत्येक न्यायाधीश इस प्रकार के विशेषाधिकारों और भत्तों तथा अनुपस्थिति की छुट्टी तथा पेंशन के संबंध में जो कि समय-समय पर संसद द्वारा या संसद के द्वारा बनाये गये कानून के अंतर्गत तय किए जा सकते हैं और जब तक तय नहीं किए जाते, द्वितीय अनुसूची में विशेष रूप से उल्लिखित ऐसे विशेषाधिकारों, भत्तों और अधिकारों का अधिकारी होगाः
बशर्ते कि न्यायाधीश के न तो विशेषाधिकार, न ही भत्ते और न ही पेंशन या अनुपस्थिति की छुट्टी के संबंध में उसके अधिकार उसकी नियुक्ति के बाद उसके नुकसान हेतु बदले जायेंगे।“
महोदय, जो कुछ मुझे कहने की आवश्यकता है वह यह कि प्रस्तुत अनुच्छेद मूल अनुच्छेद के समान है सिवाय इसके कि इसमें एक शब्द -‘विशेषाधिकार’ जोड़ा गया है। जो कि मूल पाठ में नहीं है। वे विषेशाधिकार क्या है इस पर चर्चा करने के लिए मैं अभी नहीं रूकूंगा। हम उन पर तब चर्चा करेंगे जब हम द्वितीय अनुसूची पर आयेंगे। जहाँ पर उनमें से कुछ का विशेष तौर पर उल्लेख मिलता है।
** श्री आर. के. सिधवा : .......... महोदय, जब तक आप इस अनुसूची की भाषा में संशोधन नहीं करते, मेरे विचार में, यह अनुच्छेद एक भ्रम की स्थिति में होगा। मैं जानना चाहता हूँ कि इस अनुच्छेद, जिसका डॉ. अम्बेडकर ने प्रस्ताव किया है, के संशोधन के क्या निहितार्थ होंगे। मैं देखता हूँ कि उन्होंने अनुसूची का कोई हवाला नहीं दिया है और मैं नहीं जानता कि इसके बाद वे अनुसूची का हवाला देंगे क्योंकि उससे मामला जटिल हो जायेगा और यदि मामले को संसद पर छोड़ा जाता है, जो कि सदन की इच्छाओं के विरुद्ध आदेश पारित कर सकता है कि मुख्य न्यायाधीश को एक सुसज्जित घर प्रदान किया जा सकता है, तो उद्देश्य विफल हो जायगा।
* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : उपाध्यक्ष महोदय, मुझे खेद है कि मैं अपने
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*** . वही, पृष्ठ 10सीएडी, खण्ड IX, 30 जुलाई, 1949, पृ. 10