नया अनुच्छेद 104 - Page 26

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माननीय दोस्त कुंजरू द्वारा प्रस्तावित संशोधन स्वीकार नहीं कर सकता और मेरे विचार में इस संशोधन को अस्वीकार कने के लिए दो वैध आपत्तियां हैं जो सदन के समक्ष प्रस्तुत की जा सकती हैं। प्रथम स्थान पर, सिद्धांत जिसके लिए वे संघर्ष कर रहे हैं के संबंध में, उदाहरणार्थ, न्यायाधीश के वेतन और पेंशन संबंधी अधिकार जो एक बार जब उसकी नियुक्ति हो जाती है उसके पास आ जाते हैं और संसद द्वारा बनाये गये किसी ऐसे नियम जो संसद इस विशेष मामले के संबंध में बना सकती है बदले जाने जरूरी नहीं हैं। मेरे विचार में जहाँ तक मेरे नए अनुच्छेद का संबंध है, मैंने उस मामले को संसद के न्यायक्षेत्र से बाहर रखा है। इसमें संदेह नहीं कि संसद को समय-समय पर भत्ते, पेंशन आदि में बदलाव के लिए कानून बनाने का अधिकार दिया गया है, लेकिन अनुच्छेद में इसकी व्यवस्था की गयी है कि यह कानून नये न्यायाधीशों पर ही लागू होगा और पुराने न्यायाधीशों पर इसका कोई प्रभाव नहीं होगा यदि वे उनके पास जमा हो गये अधिकारों का विरोधी है। इस प्रकार जहाँ तक सिद्धांत का संबंध है जिसके लिए वह संघर्ष कर रहे हैं वह सिद्धांत पहले से ही अनुच्छेद का अंग बना लिया गया है।

एक अन्य दृष्टिकोण से, उनका संशोधन काफी आपत्तिजनक प्रतीत होता है और इसका कारण आगे उल्लिखित है। जैसा कि प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि पेंशन का वेतन तथा वर्षों की संख्या जब तक न्यायाधीश ने सेवा की है, के साथ एक निश्चित संबंध होता है। कहने का तात्पर्य है, जैसा कि मेरे माननीय दोस्त पंडित कुंजरू ने सुझाव दिया है कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उतने वेतन से कम वेतन, जितने वेतन का उनमें से प्रत्येक न्यायाधीश संघीय अदालत के न्यायाधीशों पर लागू नियमों के मुताबिक अधिकारी होता है, नहीं मिलना चाहिए वे यह मानते हुए प्रतीत होते हैं कि संघीय अदालत का न्यायाधीश यदि सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है तो उसको उतना ही वेतन मिलना जारी रहेगा जितना कि उसे मिल रहा है। अन्यथा यह इस सिद्धांत का उल्लंघन होगा कि पेंशन वेतन और वर्षों की संख्या, जब तक व्यक्ति ने सेवा की है, के द्वारा नियमित की जाती है। हम अभी तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे हैं कि संघीय अदालत के न्यायाधीशों को जब उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्त किया जाता है वही वेतन मिलना जारी रहना चाहिए या नहीं जो उन्हें मिल रहा है। जैसा मैंने कहा यह मामला निर्णीत नहीं हुआ है और मुझे बहुत अधिक संदेह है (मैं पूर्वानुमान में कह सकता हूँ) कि क्या प्रारूपण समिति के लिए सम्भव होगा कि वह वर्तमान न्यायाधीशों व नये न्यायाधीशों के वेतन के संबंध में इस प्रकार के प्रभेद का परामर्श दे। इसलिए यह संशोधन अपरिपक्व है।

*. सीएडी, खंड IX, 30 जुलाई, 1949, पृष्ठ 12-13