नया अनुच्छेद 163-अ - Page 35

14 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बशर्ते कि इस धारा की किसी बात का, राज्य विधानपालिका में विधानपरिषद् होने की स्थिति में, इस प्रकार की विधानपालिका के दोनों सदनों में उभय पदों के सृजन करने से रोकने का अर्थ नहीं लगाया जायेगा।

(2) राज्य की विधानपालिका सदन अथवा राज्य की विधानपालिका के सदन के सचिवालयी स्टाफ में नियुक्त किए गये व्यक्तियों की सेवा की शर्तों और उनकी भर्ती को कानून के द्वारा नियमित कर सकती है।

(3) जब तक इस अनुच्छेद की धारा (2) के तहत राज्य विधानपालिका द्वारा व्यवस्था नहीं की जाती, राज्यपाल विधानसभा के अध्यक्ष अथवा विधानपरिषद के सभापति, जैसी भी स्थिति हो, के साथ परामर्श करने के बाद विधान सभा या विधानपरिषद के सचिवालयी स्टाफ में नियुक्त व्यक्तियों की सेवा की शर्तों और भर्ती को नियमित करने वाले नियम बना सकता है और इस प्रकार बनाये गये नियम इस धारा के अन्तर्गत बने कानून की व्यवस्थाओं के अधीन प्रभावी होंगे।“

यह अनुच्छेद, अनुच्छेद 79अ का केवल प्रतिरुप है जिस पर हमने इस सुबह विचार किया था।

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श्री एच. वी. कामथ : श्रीमान अध्यक्ष महोदय ......... अनुच्छेद 79अ तथा 148अ में महत्वपूर्ण बिन्दु मेरे तथा मेरे माननीय मित्र, प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना द्वारा विभिन्न संशोधनों में रखे गये। लेकिन जब उनकी बारी आयी तो डॉ. अम्बेडकर काफी अच्छे तरीके और बुद्धिमानी से पेश आये तथा उन्होंने कहा कि उनकी कुछ भी कहने की इच्छा नहीं है। निस्संदेह वे एक दृढ़, बिंदुओं की पूरी जानकारी रखने वाले हैं इसलिए जब वे हाँ कहते हैं तो पूरा सदन उनके साथ होता है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर : मैंने कहा था कि किसी उत्तर की आवश्यकता

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नहीं।

श्री एच. वी. कामथ : यह उनके निर्णय पर छोड़ा जाता है। लेकिन, जब कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु उठाये जाते हैं तब उनके लिए किसी प्रकार के उत्तर की आवश्यकता होती है। निःसंदेह उन पर ही यह निश्चय करने का दायित्व है कि वे किसका उत्तर देंगे और किसका नहीं। लेकिन सदन उनका मत सुनने का प्राधिकारी है। यदि वह ज्यादा थक गये हैं तो वे अपने किसी बुद्धिमान साथी को कह सकते हैं........

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यह कौन तय करेगा कि बिन्दु महत्वपूर्ण हैं

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