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सोचा कि संसद के लिए जिम्मेदारी लेना ज्यादा अच्छा होगा क्योंकि जितना समय प्रारुपण समिति के पास था, संसद के पास निश्चय ही उससे कुछ ज्यादा समय होगा और संसद विभिन्न प्रांतीय सरकारों की कठिनाइयां जानने, उनके दृष्टिकोण और प्रस्ताव जानने तथा ऐसा बीच का रास्ता निकालने के लिए जिसे कि कानून में बदला जा सके इन सब के लिए प्रांतीय सरकारों से पत्र व्यवहार करने की स्थिति में होगी। इसलिए, इस प्रस्ताव को आगे रखने में, मैं सोचता हूँ कि हम पहले से अपनाये गये सिद्धांतों को छोड़ नहीं रहे हैं और जैसा कि मेरे माननीय मित्र श्री. टी. टी. कृष्णमाचारी ने कहा कि उन सब पर विचार करते हुए प्रारुपण समिति को किसी भी बात के लिए क्षमा याचना नहीं करनी है अपितु प्रस्ताव को सदन के सामने रखने की सिफारिश कर देनी चाहिए।
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* पंडित गोविन्द मालवीय (संयुक्त राज्य : जनरल) : महोदय, मैं प्रस्ताव करता
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हूँ कि इस अनुच्छेद पर विचार जारी रखा जाए।
श्री ब्रजेश्वर प्रसादः मैं इस प्रस्ताव का अनुमोदन करता हूँ।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मुझे कोई आपत्ति नहीं है। हम इस पर एक बार फिर विचार कर सकते हैं।
माननीय सभापति : तब मैं यह मान लूँ कि सदस्य सहमत हैं कि यह अनुच्छेद बना रहना चाहिए। माननीय सदस्य : हाँ ।
नया अनुच्छेद 163-अ
** माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : महोदय मैं प्रस्ताव रखने की प्रार्थना करता हूँः
“संशोधन के संशोधन की सूची 1 (प्रथम सप्ताह) की संशोधन सं. 12 में प्रस्तावित नये अनुच्छेद 163-अ के लिए, अधोलिखित को प्रतिस्थापित किया जाएः-
“163-अ (1) अथवा प्रत्येक सदन किसी राज्य की विधानपालिका के सदन का राज्य विधानपालिकाओं का सचिवालयी स्टाफ होगा - अलग सचिवालयी स्टाफ होगाः
* ख्., सीएडी, खंड IX, 30 जुलाई, 1949, पृ. 37
** ख्., वही, पृष्ठ 37