बंबई पुलिस अधिनियम-संशोधन विधेयक
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हुआ है कि मेरे संशोधन ने, जिस रूप में मेरे द्वारा इसे शब्दांकित किया गया है, उसने एक गलत धारणा पैदा कर दी है और जो प्रभाव मैं इसके द्वारा उत्पन्न करना चाहता था, उससे यह बहुत अलग है। मैं इस मौके पर एक ही बात कहना चाहूंगा। मैं मानता हूं कि यह ऐसा अवसर नहीं है, जब हममें से कोई भी इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना ले। मैं यह बात फिर से कहना चाहता हूं, क्योंकि मैं समझता हूं कि यह अवसर बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। महोदय! मैं यह भी कहना चाहता हूं कि माननीय गृह मंत्री ने अपना जवाब देते समय इस बात को ध्यान में नहीं रखा कि उनको आपातकाल से निपटने के लिए हमने काफी अधिकार दिए हैं और जो अधिकार उनको मेरे संशोधन के द्वारा दिए गए हैं, अपने आप में इतने व्यापक हैं कि इनसे वह उन व्यक्तियों से भी निपट सकते हैं, जो बुरे इरादे रखते हों। महोदय! आपातकाल से निपटने के लिए यथासंभव व्यापक अधिकार गृह मंत्री को दे देने के बाद इस पक्ष के सदस्यों को सामान्य अवसरों से निपटने के लिए उन्हें अधिकार देने के मामले में छिद्रान्वेषण का रवैया अपनाना बिल्कुल सही है। वह पूरी तरह इस बात को भूल गए हैं कि विचाराधीन विधेयक सामान्य अवसरों के लिए अधिकार देता है। इसका असामान्य अवसरों से कोई संबंध नहीं है और इसलिए मुझे ऐसी कोई संभावना नहीं दिखाई देती, जिसमें मेरे संशोधन के तहत दिए गए अधिकारों का उपयोग करते हुए पुलिस आयुक्त परिस्थिति से निपटने में सक्षम नहीं होगा। इसलिए मैं निवेदन करता हूं कि मेरे इस संशोधन को स्वीकार करना जनता और सभी संबंधित वर्गों के हित में ही होगा। महोदय! मेरा कहना यह है कि यह एक बहुत महत्त्वपूर्ण अवसर है और विधेयक नागरिकों की स्वतंत्रता जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों से संबंधित है, इसलिए मैं समझता हूं कि यह एक ऐसा प्रमुख अवसर है, जिस पर सभी तरफ से यथासंभव सहमति होनी चाहिए। इसलिए मैं माननीय गृह मंत्री महोदय से अपील करता हूं कि वह इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाएं जैसा कि मैंने नहीं बनाया है और इस संशोधन को स्वीकार कर लें। महोदय, मैं अपने माननीय मित्र श्री चुंद्रीगर और श्री बोले के संशोधन को स्वीकार करता हूं।
माननीय के.एम. मुंशी : यह प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। हमने प्रत्येक शब्द की जांच की है, हर सुझाव के आशय पर विचार किया है। इसके बाद किसी व्यक्ति को आदतन संलिप्त होने के विषय में कोई शंका नहीं रह गई है।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : कभी-कभी बेहतर विचार फिर से आते हैं।
माननीय के.एम. मुंशी : महोदय! जैसा कि मैंने कहा, यह प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। प्रश्न विचारों की भिन्नता का है, क्योंकि अगर प्रत्येक मामले में हमें यह पता लगाना है कि क्या मामलों में अंतर्ग्रस्त व्यक्ति आदतन शामिल है या नहीं। इसमें पहली बार जो संलिप्त हुआ है, वह तो बच जाएगा। वह धारा को व्यर्थ बना देगा
* बोंबे लेजिस्लेटिव असेम्बली डिबेट्स, खंड 3, पृ. 2586-87, 29 अप्रैल 1938