11. बंबई पुलिस अधिनियम-संशोधन विधेयक - Page 173

156 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

मुख्य उद्देश्य (उनके ही शब्दों में) पक्के मवालियों को पकड़ना है। अगर मैं ‘पक्का मवाली’ शब्दों का अर्थ समझता हूं, तो मेरा मानना यह है कि पक्का मवाली वह व्यक्ति है, जो आदतन ऐसी वारदातें करता है, जो खतरनाक और दुस्साहसी होता है और जो आदतन गैर-कानूनी कामों में लिप्त होता है। अगर माननीय गृह मंत्री का यह इरादा है, तो उन्हें उन इरादों को, जिन्हें उन्होंने सदन में स्वीकार किया है, स्पष्ट शब्दों में कानून में समावेश करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इसलिए इस दृष्टिकोण से मैंने उनकी भाषा को संशोधित करने की कोशिश की है, इस बात पर जोर देते हुए कि वह व्यक्ति निश्चित रूप से आदतन ये सब कुछ कर रहा हैः

कि बंबई नगर की सीमा के अंदर कोई व्यक्ति आदतन गैर-कानूनी गतिविधियों

में लिप्त है, जो नगरवासियों के लिए इतना खतरनाक है और दुस्साहसी है

कि नगर में उसकी मुक्त उपस्थिति ज्यादा संकट पैदा करने वाली है और जो

आदतन इनमें लिप्त...

संशोधन का शेष हिस्सा माननीय सदस्य पाटस्कर के संशोधन के समान ही है। मैं मान लेता हूं कि माननीय गृह मंत्री को उस संशोधन के आधिकारिक शासकीय संशोधन बन जाने पर कोई आपत्ति नहीं है।

मैंने जो करने की कोशिश की है, वह कुछ भी नया नहीं है। मैंने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 110 से शब्द लिए हैं। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 110 पुलिस को उस व्यक्ति पर, जो आदतन डकैत हो, प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष मुकदमा चलाने का अधिकार देती है। मैंने धारा 110 की उपधारा (क) और उपधारा (च) के शब्द लिए हैं। यह तर्क दिया जा सकता है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 110 के अंतर्गत, यद्यपि कोई आदमी आदतन डकैत है अथवा कोई आदमी आदतन दुस्साहसी और खतरनाक चरित्र वाला है, तो भी बिना मुकदमे के उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती। आप उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों करना चाहते हैं, क्योंकि वह बंबई नगर में है? इस पर मेरी सफाई यह है कि हम उन मामलों के बारे में बात कर रहे हैं, जिनमें लोग अदालत में गवाही देने के लिए तैयार नहीं हैं और यही कारण है कि मैंने पुलिस आयुक्त को न्यायिकोत्तर और कानूनोत्तर अधिकार देने पर अपनी सहमति दी है। ऐसे अधिकार देने में यह आवश्यक है कि ऐसे लोगों की कोटि को निश्चित और परिभाषित किया जाए, जिनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। मेरा निवेदन यह है कि सदन के लिए इस कोटि को परिभाषित करना उचित होगा। यह कहकर कि व्यक्ति आदतन गैर-कानूनी काम कर रहा है, न कि संयोगवश। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपना संशोधन सदन के सुपुर्द करता हूं।

II *

डॉ. भीमराव अम्बेडकर (बंबई नगर) : महोदय! मुझे यह जानकर बहुत खेद