11. बंबई पुलिस अधिनियम-संशोधन विधेयक - Page 176

बंबई पुलिस अधिनियम-संशोधन विधेयक

सकते हैं।

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डॉ. भीमराव अम्बेडकर : निश्चित रूप से मंत्री महोदय उस आदमी के मामले पर विचार करना नहीं चाहते, जिसने कभी कोई छिटपुट अपराध किया हो।

माननीय श्री के.एम. मुंशी : मैंने माननीय सदस्य को उस गिरोह का उदाहरण दिया था, जो कलकत्ता से आया था। उसमें 11 आदमी ऐसे थे, जिन्होंने कोई अपराध नहीं किया था, लेकिन जो किसी गैर-कानूनी गतिविधि में शामिल होने वाले थे। पुलिस की सतर्कता के बावजूद कलकत्ता में उन्हें अपराधी सिद्ध नहीं किया जा सका। उनमें से कुछ ऐसे आदमी थे जो . . .

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : अगर वे लोग कलकत्ता में अपराध करते रहे थे, तो वे आदतन अपराधी रहे होंगे। इसका मतलब यह नहीं है कि कोई बंबई में ही आदतन अपराध करता हो।

माननीय श्री के.एम. मुंशी : उनको गैर कानूनी काम करने के लिए दोषी नहीं ठहराया गया था।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : क्या मैं मंत्री महोदय का ध्यान अपने संशोधन के शब्द विन्यास की तरफ आकर्षित कर सकता हूं? वह यह है ”. . . जो इतना दुस्साहसी और खतरनाक है कि उसका शहर में मुक्त रहना संकट पैदा करने वाला है . . .“ गिरोह का कोई भी सदस्य इसके तहत आ जाता है।

माननीय श्री के.एम. मुंशी : अगर माननीय सदस्य धैर्य रखें तो मैं उन्हें बताऊंगा। जैसा कि मैंने गिरोह के नेता का उदाहरण दिया, वह दुस्साहसी नहीं भी हो सकता है। वह शायद कलकत्ता में मोटरकार में घूम रहा था। वह यूरोपीय था और बंबई के सभ्य समाज में स्वीकृत था, लेकिन वह उस अर्थ में दुस्साहसी नहीं था कि एक लाठी लेकर रास्तों पर दौड़ता फिरे।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : लेकिन वहां ‘खतरनाक’ शब्द भी है।

माननीय श्री के.एम. मुंशी : अब, महोदय! ‘खतरनाक’ शब्द का क्या अर्थ होता है?

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मैंने धारा में प्रयुक्त शब्द लिए हैं और इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है कि वे शब्द पूरी तरह समझ में आने वाले हैं।

माननीय श्री के.एम. मुंशी : महोदय! दुस्साहसी और खतरनाक शब्द उन दादा लोगों के लिए हैं, जो बेकाबू हैं या लोगों को धमकाते हैं या शारीरिक अर्थ में खतरनाक सिद्ध हो रहे हैं। वे जालसाज गिरोह के नेता पर लागू नहीं होते।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : लेकिन इन पर तो अलग से एक पूरा अध्याय है, जिसमें इस पर पूरा विचार किया गया है, जैसे भारतीय दंड संहिता का अध्याय 16 जिसे मैंने छोड़ दिया है।

* बोंबे लेजिस्लेटिव असेम्बली डिबेट्स, खंड 3, पृ. 2598-99, 29 अप्रैल 1938