160 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
माननीय श्री के.एम. मुंशी : लेकिन आपने कहा है, ‘आदतन संलिप्त’।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! मैं सदन के सामने इस बात का उल्लेख करना चाहता हूं कि जो शब्द मैंने अब प्रस्तावित किए हैं, उनसे इस धारा के क्षेत्र के अंतर्गत केवल कुछ खास किस्म के लोग ही आ सकेंगे और उन लोगों के बहुत सारे मामले इसके अंतर्गत नहीं आएंगे, जो मौजूदा धारा के अंतर्गत आ जाते हैं।
माननीय श्री के.एम. मुंशी : महोदय, जैसा कि माननीय सदस्य ने खुद स्वीकार किया है कि वे शब्द विधेयक के क्षेत्र को सीमित कर देते हैं, यदि ऐसा ही है तो इस विधेयक का कोई मतलब नहीं होगा, अगर वह धारा को उस हद तक मंद कर देते हैं तो इस विधेयक को जिस उद्देश्य के लिए तैयार किया गया था, उसके लिए यह एक बेकार हथियार सिद्ध होगा। इसलिए मेरे लिए इस संशोधन को स्वीकार करना संभव नहीं है।
माननीय अध्यक्ष : अब मुझे संशोधन और संशोधन के संशोधनों को सदन के सामने रखना है। पहले मैं संशोधन के संशोधनों को लूंगा। इसलिए सबसे पहले मैं श्री भोले का संशोधन जो डॉ. अम्बेडकर के संशोधन में संशोधन करने से संबंधित है, सदन में मत के लिए रखूंगा। क्या इसे पढ़ने की मुझे जरूरत है? (माननीय सदस्य ः नहीं) इसलिए अब मैं प्रश्न रखूंगा।
प्रश्न रखा गया।
माननीय अध्यक्ष : यह विरोधकर्ताओं के पक्ष में रहा।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! यह केवल इरादा प्रकट करने का प्रश्न था। यह कोई ठोस संशोधन नहीं है।
माननीय अध्यक्ष : यह ठोस नहीं है, फिर भी माननीय सदस्य डॉ. अम्बेडकर के संशोधित संशोधन को अंत में सदन के सम्मुख रखना होगा।
इसलिए इससे किसी भी तरफ से कोई अंतर नहीं पड़ता। मैं पुनः एक बार ध्वनिमत लूंगा। संशोधन रखा गया और अनुमोदित हो गया।
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डॉ. भीमराव अम्बेडकर (बंबई नगर) : मैं अपने माननीय मित्र श्री चुंद्रीगर द्वारा प्रस्तावित संशोधन का समर्थन कर रहा हूं। संशोधन अपेक्षा करता है कि पुलिस आयुक्त अपने कब्जे में लिए गए सामान पर कोई कार्रवाई करे, इससे पहले उसे उस व्यक्ति को जिसे वह निर्वासित करना चाहता है, मजिस्ट्रेट के सम्मुख सामग्री सहित पेश करे, और जब तक मजिस्ट्रेट संतुष्ट नहीं हो जाए, तब तक कोई कार्रवाई न करे। स्पष्टतः इस संशोधन का उद्देश्य एक और रक्षोपाय के रूप में यह देखने के लिए है कि पुलिस आयुक्त कोई मनमानी तो नहीं कर रहा है। महोदय! क्या यह संशोधन जो रक्षोपाय के रूप में है, उन लोगों पर ऐसी कार्यवाही करता है, जिसमें ज्यादती होती हो, अथवा क्या
* बोंबे लेजिस्लेटिव असेम्बली डिबेट्स, खंड 3, पृ. 2630-34, 29 अप्रैल 1938