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216 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

स्वाधीन देश बन जाएगा (सदस्यों ने खुशी प्रकट की) उसकी स्वाधीनता का क्या होगा? वह अपनी स्वतंत्रता बनाए रखेगी अथवा फिर खो देगी? यह पहला विचार मेरे मन में आता है। ऐसा नहीं है कि भारत पहले कभी स्वतंत्र देश रहा ही नहीं है। बात सिर्फ यह है कि उसने अपनी स्वतंत्रता एक बार खो दी थी? क्या वह अपनी स्वतंत्रता दूसरी बार फिर खो देगी? यह विचार मेरे मन में भविष्य के लिए बहुत अधिक चिंता भर देता है, मुझे जिस बात से सबसे अधिक परेशानी होती है, वह इस तथ्य को लेकर है कि भारत ने केवल अपनी स्वतंत्रता ही नहीं खोई थी, बल्कि वह स्वतंत्रता उसने हमारे अपने कुछ लोगों के द्वारा विश्वासघात और देशद्रोह किए जाने के कारण खोई थी। मोहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध पर आक्रमण किए जाने के समय राजा दाहिर के सेनापति ने मोहम्मद बिन कासिम के एजेंटों से घूस ले ली थी और अपने राजा की ओर से लड़ने से इन्कार कर दिया था। यह जयचंद या जिसने मोहम्मद गोरी को भारत आने तथा पृथ्वीराज के साथ युद्ध करने का न्योता भेजा था तथा अपनी ओर से तथा सोलंकी राजाओं की ओर से सहायता करने का वचन दिया था। जब शिवाजी हिंदुओं की मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे थे, तो अन्य मराठा सरदार और राजपूत राजा मुगल सम्राटों की तरफ से लड़ रहे थे। जब अंग्रेज सिक्ख शासकों को तहस-नहस करने की कोशिश कर रहे थे उस समय उनका प्रमुख सेनापति गुलाब सिंह चुप-चाप बैठा था और सिक्ख राज्य को बचाने के लिए कोई सहायता नहीं की। 1857 में जब भारत के अधिकतर भागों में अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संघर्ष शुरू हो चुका था, तो सिक्ख चुपचाप खड़े रहे तथा मौनदर्शक बने रहे।

क्या इतिहास स्वयं को दुहराएगा? इस विचार से मैं चिंता में पड़ जाता हूँ। चिंता इस तथ्य को महसूस करके और गहरा जाति है कि इनको जातियों तथा धर्मों के रूप में मौजूद हमारे पुराने दुश्मनों के अलावा यहाँ बहुत सारे राजनीति दल होने जा रहे हैं जिनके अलग-अलग विचार होंगे और वे राजनीतिक विश्वासों के विरोधी होंगे। क्या भारतीय देश को अपनी जातियों से ऊपर रखेंगे तो हमारी स्वतंत्रता दूसरी बार खतरे में पड़ जाएगी और संभवतः हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। हमें इस स्थिति से स्वयं की रक्षा करनी चाहिए। हमें अपने खून के अंतिम कतरे से भी अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ होना चाहिए। (सदस्यों ने खुशी प्रकट की)।

26 जनवरी, 1950 को भारत इस अर्थ में एक लोकतांत्रिक देश हो जाएगा कि उस दिन लोगों की लोगों के लिए और लोगों के द्वारा सरकार होगी। मेरे मन में वही विचार आता है। उसके लोकतांत्रिक संविधान का क्या होगा? क्या वह उसे संभाल कर रख पाएँगे या वह फिर से खो देगा? मेरे मन में यह दूसरा विचार आता है जो मेरे मन को पहले की तरह चिंतित कर देता है।