217
ऐसा नहीं है कि भारत को लोकतंत्र के बारे में पता नहीं था। एक समय था कि भारत में कई गणतंत्र हुआ करते थे, जहाँ कहीं राजतंत्र था भी तो वे या तो निर्वाचित होते थे या फिर सीमित अर्थ में थे। वे कभी भी पूर्ण राजतंत्र नहीं थे। ऐसा नहीं है कि भारत को संसद तथा संसदीय प्रक्रिया की जानकारी नहीं थी। बौद्ध भिक्षु संघों के अध्ययन से यह पता चलता है कि न सिर्फ वहाँ संसद हुआ करते थे क्योंकि संघ और कुछ नहीं संसद के ही रूप थे लेकिन साथ ही संघों को संसदीय प्रक्रिया के नियमों की जानकारी भी थी तथा उनका पालन भी किया जाता था, जैसा कि आधुनिक समय में होता है। बैठने की व्यवस्था संबंधी नियम, प्रस्तावों से संबंधित नियम, संकल्पों, गणपूर्ति, हित, विह्प, मतों आदि संबंधी नियम भी बने हुए थे। यद्यपि संसदीय प्रक्रिया के इन नियमों को बुद्ध द्वारा संघों की बैठकों में लागू किया जाता था उन्होंने यह नियम अपने समय में देश में कार्यरत राजनीतिक सभाओं के नियमों से लिए होंगे।
भारत ने उस लोकतांत्रिक प्रणाली का खो दिया। क्या वह दुबारा इसे खो देगी? मैं नहीं जानता, लेकिन भारत जैसे देश में यह बिल्कुल संभव है जहाँ लंबे समय तक लोकतंत्र का प्रयोग नहीं होने के कारण यह बिल्कुल नया लगे, लोकतंत्र के स्थान पर तानाशाही आ जाने का खतरा है। इस नवजात लोकतंत्र के लिए यह संभव है कि उसका सहज रूप बरकरार रहे पर वास्तव में तानाशाही का शासन शुरू हो जाए। यदि भू-स्खलन होता है, तो दूसरी बात की संभावना का खतरा कहीं अधिक हो जाता है। यदि हम चाहते हैं कि लोकतंत्र की केवल खाल बचाकर ही नहीं रखें, बल्कि उसे वास्वत में बनाएँ, तो हमें क्या करना चाहिए। मेरे विचार से पहली चीज हमें यह करनी चाहिए कि हमें अपने सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए संवैधानिक तरीकों पर भरोसा रखना चाहिए इसका अर्थ यह हुआ है कि हमें क्रांति के खूनी तरीकों का परित्याग कर देना चाहिए। इसका अर्थ है कि हमें नागरिक अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह का तरीका छोड़ देना चाहिए। आर्थिक और सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए तब संवैधानिक तरीका अपनाने का कोई रास्ता मौजूद नहीं हो, तो फिर गैरसंवैधानिक तरीके को सही ठहराया जा सकता है। लेकिन जहाँ संवैधानिक तरीके का विकल्प हो वहाँ इन असंवैधानिक तरीकों अपनाने का कोई औचित्य नहीं है ये तरीके और कुछ नहीं_ अराजकता की शुरुआत है। जितना जल्दी उन्हें छोड़ दिया जाए, हमारे लिए उतना ही बेहतर है।
दूसरी चीज हमें सावधानी बरतनी चाहिए जो जॉन स्टुअर्ट मिलने उन सभी के लिए कहा है जिनकी रुचि लोकतंत्र को बचाकर रखने में है अर्थात् अपनी स्वतंत्रता किसी भी व्यक्ति चाहे वह कितना भी महान क्यों न हो, के चरणों में अर्पित नहीं की तो उसकी शक्ति पर इतना भरोसा मत करो कि वह उन संस्थाओं को ही पराधीन