33
के उपबंधों के अधीन रहते हुए, विधान-मंडल में प्रयोग की जाने वाली भाषा
राज्य के विधान-मंडल में कार्य राज्य की राजभाषाओं या हिंदी में या अंग्रेजी
में किया जाएगाः
परंतु, यथास्थिति, विधानसभा का अध्यक्ष या विधान सभा का सभापति अथवा उस रूप में कार्य करने वाला व्यक्ति किसी सदस्य को, जो पूर्वोक्त भाषाओं में किसी भाषा में अपनी पर्याप्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता है, अपनी मातृ-भाषा में सदन को संबोधित करने की अनुज्ञा दे सकेगा।
(2) जब तक राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तब तक इस संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् यह अनुच्छेद ऐसे प्रभावी होगा मानो ‘‘या अंग्रेजी में’’ शब्दों का उसमें से लोप कर दिया गया हो।
महोदय, मेरे विचार से किसी टिप्पणी की जरूरत नहीं है। अनुच्छेद अपने-आप में काफी स्पष्ट है।
* * * * *
1 श्री नजरुद्दीन अहमदः यदि आप क्षेत्रीय भाषा को विकसित नहीं होने देंगे, तो राजभाषा के विकास में उनका योगदान काफी कम रहेगा।
श्री सभापतिः क्या अभी प्रस्तावित संशोधनों में इसका उल्लेख नहीं है?
श्री नजरूद्दीन अहमदः मैं प्रारुप समिति से उस पर विचार करने का अनुरोध करूँगा। यह महज एक सुझाव है_ इसे उपयुक्त स्थान दिया जाना चाहिए। मैं यह जानता हूँ कि यह केवल मेरी एक भावना बनकर रह जाएगी क्योंकि यह स्वीकृत नहीं होने जा रहा है।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्राः क्या आप भाषा के प्रश्न पर चर्चा की अनुमति दे रहे हैं? भाषा का पूरा प्रश्न सभा के समक्ष उठ रहा है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः नहीं, नहीं, पूरे प्रश्न पर चर्चा की जा चुकी है तथा उस पर निर्णय लिया जा चुका है।
{ डा. अम्बेडकर के उपर्युक्त संशोधन स्वीकृत हुए। अनुच्छेद 99 और 184 यथासंशोधित रूप में संविधान में जोड़े गए। }
1 वही, पृष्ठ 1666