2 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय उपाध्यक्षः कृपया अंग्रेजी में भाषण दें।
पंडित ठाकुर दास भार्गवः चूंकि यह निर्णय अत्यधिक महत्व का है। अतः इसी कारण से मैं हिंदी में भाषण देना चाहूँगा।
डॉ. मनमोहन दास (पश्चिम बंगालः सामान्य)ः हम माननीय शिक्षा मंत्री द्वारा हिंदुस्तानी में बोले गये भाषण को समझ सकते हैं। यह भाषण सेठ गोविन्ददास अथवा पंडित ठाकुर दास भार्गव द्वारा हिन्दी अथवा हिन्दुस्तानी में बोले गये भाषणों से नितान्त भिन्न है। नौसिखियों के रूप में हम यह नहीं जानते हैं कि हिन्दुस्तानी क्या है।
माननीय उपाध्यक्षः ऐसा कोई भी स्थापित मानक नहीं है जिसकी यहां नकल की जाये जो कुछ भी बोला जाता है, वही हिन्दुस्तानी है।
पंडित ठाकुर दास भार्गवः अपना भाषण प्रारम्भ करने से पूर्व ( माननीय सदस्यगण ः कृपया अंग्रेजी में बोलें) कई सदस्यों की इच्छा है कि मुझे अंग्रेजी में बोलना चाहिये। मुझे माननीय सदस्यों की इच्छा का आदर करने में तनिक भी हिचक नहीं है। परन्तु सभी माननीय सदस्य जानते हैं कि खुद को अंग्रेजी की अपेक्षा अपनी भाषा में अभिव्यक्त करना अधिक सरल है। अतः यदि मुझे अनुमति दी जाये तो मैं हिंदी में बोलना चाहता हूँ। परन्तु यदि वे मुझे अंग्रेजी में बोलने के लिए ही कहते हैं तो मुझे अंग्रेजी में अपना भाषण प्रारम्भ करने में किसी प्रकार की हिचक नहीं होगी। ( माननीय सदस्यगण ः ‘हिंदी हिंदी’) जैसा कि मेरा विचार है कि अधिकांश माननीय सदस्य अंग्रेजी में बोलने पर जोर नहीं दे रहे हैं, अतः मैं हिंदी में बोलना चाहता हूँ।
श्रीमती जी दुर्गा बाई (मद्रासः सामान्य)ः कृपया सरल हिंदी में भाषण दें, ताकि हम भी समझ सकें।
पंडित ठाकुर दास भार्गवः मैं सरलतम हिंदी में बोलने की कोशिश करूंगा। आज जब सदन के समक्ष मैं हिंदू संहिता विधेयक के बारे में भाषण देने के लिए खड़ा हुआ हूँ, तो मेरे हृदय में अनेक परस्पर-विरोधी विचार कचोट रहे हैं। प्रारम्भ में ही निवेदन करना चाहता हूँ कि मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो यह घोषित करते हैं कि हिंदू संहिता विधेयक, हिंदू-संस्कृति और हिंदू-सभ्यता की मृत्यु का शंखनाद होगा। मेरी यह इच्छा है कि हिंदू-संस्कृति, हिंदू-समाज और हिंदू-सभ्यता अनन्त काल तक जीवित रहे जब तक कि इस विश्व का अन्त न हो जाये। मैं किसी भी प्रकार से इस का विरोधी नहीं हूँ। मैं थोड़ा भी भयभीत नहीं हूँ कि यह विधेयक या अन्य कोई विधेयक हिंदू-संस्कृति या सभ्यता को किसी भी प्रकार से कोई हानि पहुंचायेगा। मेरी इच्छा है कि वे सभी दुर्गुण जो काफी समय से हिंदू समाज में घर कर गये हैं और जिनके बारे में डॉ. अम्बेडकर ने इस सदन के समक्ष अपने निष्कर्ष में अपील की है, उसे हटाया जा सकता है और उस