हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 18

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अपील पर गहरे चिन्तन और शाक्त-हृदय से सोचा जा सकता है। परन्तु वास्तव में, यदि हिंदू समाज को संरक्षित किया जाना है तो इसमें सन्देह नहीं कि यदि समाज के सुधार के लिए आवश्यकता महसूस की जाएगी तब फिर समाज सुधार करना होगा।

दोपहर 12 बजे

मैं कठोरता से उन व्यक्तियों का विरोध करता हूँ जो इस बात का समर्थन करते हैं कि यह विधेयक, हिंदू संस्कृति का अन्त कर देगा। मैं यह स्वीकार करने के लिए एक क्षण के लिए भी तैयार नहीं हूँ। वह तथ्य कि यह सदन अथवा इस सदन के माननीय सदस्य जो प्राचीन-काल के स्मृतिकारों के समान योग्यता रखते हैं, उनके पास शास्त्रों अथवा कानून में कोई परिवर्तन करने का अधिकार नहीं है। मैं इस बात का समर्थन करता हूँ कि प्रत्येक सदस्य और समुदाय सदस्यों को समय की आवश्यकताओं के अनुरूप कानून बनाने का पूरा अधिकार है। आज, यदि कोई अपील करता है कि यह एक पुराना रिवाज होने से हमें तद्नुसार कार्य करना चाहिए। तब इस आरोप के बारे में यह निवेदन करना चाहूँगा कि ऐसा एक भी रिवाज नहीं है जिससे भारत ने प्रयोग न किया हो। भारत में कुछ ऐसे स्थान हैं जहां उत्तराधि-कार की पद्धति भारत के अन्य भागों से नितान्त भिन्न है। क्या हम यह नहीं जानते कि खासी जन-जातियों और दक्षिणी पंजाब के कुछ भागों में उत्तराधिकार की समूची पद्धति इस तथ्य पर आधारित है कि सम्पूर्ण सम्पति बेटों की अपेक्षा बेटियों के अधिकार में होती है। भारत में कुछ ऐसे भी भाग हैं जहां लड़की को ससुराल जाने के स्थान पर लड़की के पति को पत्नी के परिवार में ही लाया जाता है। भारत ऐसा देश है जहां प्रत्येक प्रकार का रिवाज और कानून प्रचलन में रहा। क्या ऐसी कोई एक सामाजिक प्रणाली है, जिसका हमने परीक्षण न किया हो। कल ही डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि कुछ स्मृतियों में इस बात का उल्लेख है कि बेटियों को बेटों के साथ समान रूप से उत्तराधिकारी घोषित किया जाना चाहिये। अतः यह व्यवस्था काफी समय से विद्यमान थी। इसके अलावा मैं ऐसा कोई कानून नहीं जानता जिसे नया कानून कहा जा सकता है। तलाक आज भी कई स्थानों में प्रथागत है। प्राचीन स्मृतियों के अध्ययन करने से यह विदित होता है कि उनमें भी तलाक का उल्लेख है। मैं यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हूँ कि हमें उन प्राचीन आदर्शों को उलट देना चाहिए क्योंकि उनका उल्लेख प्राचीन स्मृतियों में किया गया है। यदि हम सोचते हैं कि वे आदर्श हमारे आज के समाज के उपयुक्त नहीं हैं, तो ऐसे आदर्शों का पालन क्यों किया जाये। मैं जानता हूँ कि भारत में एक समय ऐसा था जब विवाह संस्था स्वयं भारत में प्रचलित नहीं थी और लोग विवाहों के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। प्राचीन काल में नियोग की प्रणाली भारत में काफी समय तक प्रचलित रही। हिंदू कानून में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है। इनमें से कुछ विवाह ऐसे भी हैं जिन्हें विवाह नहीं कहा जा सकता। क्या कोई इस बात को स्वीकार कर सकता है कि इस प्रकार के आदर्शों को वर्तमान समय में पुनः प्रारम्भ किया जाना चाहिये। मेरे विचार