312 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हिंदू संहिता का विरोध करने वाले इसमें बाधाएं डालते रहे और विधेयक के पारित होने में विलम्ब करवाते रहे। परिणामस्वरूप अंतः 10 अक्तूबर को डॉ. अम्बेडकर ने अपना त्याग-पत्र सौंप दिया और उद्विग्न होकर सदन छोड़ गए।
हिंदू संहिता पर हुए उस सम्पूर्ण वाद-विवाद को विधेयक के संविधान सभा में पेश किये जाने से लेकर 10 अक्तूबर, 1951 तकµइस पुस्तक को चार भागों में बांटा गया है। पहला भाग संबंधित विधेयक को इसको सदन में पेश किये जाने हेतु से संबद्ध है। इसमें विधेयक की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए डॉ. अम्बेडकर के भाषण के अलावा डॉ. पट्टाभिसीता रमैय्या, नजीरुद्दीन अहमद, श्रीमती हंसा मेहता, श्री राम सहाय, डॉ. बी.बी. केसकर, बेगम ऐजाज रसूल तथा श्री आर.के. चौधरी के भाषण सम्मिलित है। इस भाग में 17 नवम्बर, 1947 से लेकर 9 अप्रैल, 1948 तक की चर्चा शामिल की गयी है।
पुस्तक के दूसरे भाग में हिंदू संहिता का वह प्रारूप दिया है जिसे डॉ. अम्बेडकर ने तैयार किया था और जिसे प्रवर समिति ने संशोधित कर तत्कालीन हिंदू संहिता का स्वरूप दिया था। इसे यहां इस उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है कि लोगों को पता चल सके कि हिंदू विधि के मूलभूत ढांचे में सुधार के बारे में डॉ. अम्बेडकर की मूल धारणा क्या थी।
तीसरे भाग में हिंदू संहिता पर सामान्य चर्चा दी गयी है। कुछ माननीय सदस्यों ने इस तरह के परिवर्तनकारी कानून बनाये जाने के संविधान सभा के अधिकार को लेकर प्रश्न खड़े किये हैं, तो कुछ सदस्यों ने तलाक तथा महिलाओं के सम्पत्ति सम्बन्धी अधिकारों पर आपत्ति की है। कुछ अन्य सदस्यों ने इस विधेयक को हिंदुओं के धार्मिक मामलों में दखलअंदाजी मानकर इसका बहिष्कार किया। तथापि, प्रगतिशील विचारों वाले सदस्यों ने इसका समर्थन किया और उन्होंने डॉ. अम्बेडकर के इस साहसिक कदम की सराहना की।
इस के चौथे भाग में हिंदू संहिता विधेयक पर खंडवार चर्चा दी गयी है।
हालांकि, प्रस्तुत पुस्तक डॉ. अम्बेडकर के लेखन का एक भाग है, लेकिन हिंदू संहिता के माध्यम से हिंदू समाज में सुधार लाना, उनके जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना थी। हिंदू संहिता पर की गयी चर्चा तथा वाद-विवादों के माध्यम से हिंदू संहिता के बारे में डॉ. अम्बेडकर द्वारा अदा की गयी भूमिका हिंदुओं के सामाजिक-आर्थिक अध्येताओं के लिए बहुत ही उपयोगी है। इसलिए इस ग्रंथ पर कार्य कर रही समिति के सदस्यों ने महसूस किया कि केवल डॉ. अम्बेडकर के भाषणों के बजाय इस ग्रंथ में सम्पूर्ण चर्चा को प्रकाशित किया जाये।
आशा है कि यह संकलन विद्वानों, साधारण पाठकों तथा इतिहासकारों सबके लिये समान रूप से उपयोगी होगा और वे हिंदू समाज के विभिन्न वर्गों को अब प्राप्त स्वतंत्रता में डॉ.अम्बेडकर के योगदान की सराहना करेंगे।