अनुभाग एक हिंदू संहिता विधेयक को प्रवर समिति को सौंपा जाना (17 नवम्बर, 1948 से 9 अप्रैल, 1948 तक) - Page 367

352 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

की विचारधारा के अनुसार निर्णीत कर सकते हैं। जब समाज परिवर्तन की स्थिति में होता है, भूतकाल को छोड़कर भविष्य की तरफ जाता है तो वहां बाध्यकारी विपरीत सोच-विचार होता हैं। एक भूततकाल की ओर खिंचता है तो दूसरा भविष्य की ओर और जो परीक्षण हम करना चाहते हैं वह और कुछ नहीं है बल्कि वह किसी के अन्तःकरण का परीक्षण है। मुझे बिल्कुल भी संदेह नहीं है कि इस विधेयक के उपबंध किसी समुदाय की चेतना के अनुसार ही है और अतः मुझे उन उपायों को आगे लाने के लिए बिल्कुल संकोच नहीं है यद्यपि वास्तव में यह हो सकता है कि हमारे अधिकांश देशवासी इसे स्वीकार न करें।

माननीय अध्यक्षः प्रश्न यह है कि फ्हिंदू कानून के विभिन्न भागों को संशोधन करने और संहिताबद्ध करने हेतु यह विधेयक प्रवर समिति को भेजा जाए जिसमें श्री अलादी कृष्णस्वामी अय्यर, डॉ. बख्शा टेकचन्द, श्री एम. अनन्त सायनम आयंगर, श्रीमती जी. दुर्गाबाई, श्री एल. कृष्णास्वामी भारती, श्री यू. श्रीनिवास मलैया, श्री मिहिर लाल चट्टोपाध्याय, डॉ. पी.एस. देशमुख, श्रीमती रेणुका रे, डॉ. पी.के. सेन, बाबू रामनारायण सिंह, श्री किशोरी मोहन त्रिपाठी, श्रीमती अम्मू स्वामीनाथन, पं. बालकृष्ण शर्मा, श्री

खुर्शीद लाल, श्री बजेश्वर प्रसाद, श्री बी. शिवाराव, श्री बलदेव स्वरूप, श्री वी.सी. केशव राव तथा विधेयक प्रस्तुत करने वाले सम्मिलित हैं। इस निर्देश के साथ कि प्रतिवेदन प्रस्तुत करने में विधानसभा के अगले सत्र के प्रथम सप्ताह के अन्तिम दिन से अधिक समय नहीं लेंगे और समिति की बैठक के लिए आवश्यक उपस्थित सदस्यों की संख्या पांच होगी।’’

प्रस्ताव स्वीकृत हुआ।

माननीय अध्यक्षः इसी के साथ एक लम्बा सत्र समाप्त होता है जो 28 जनवरी से शुरू हुआ था और मैं सभी सदस्यों को उनके विश्वसनीय सहयोग के लिए, जो कि इसे सदैव मिलता रहा, हार्दिक धन्यवाद देता हूँ।

(तत्पश्चात् विधानसभा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुई।)