अनुभाग एक हिंदू संहिता विधेयक को प्रवर समिति को सौंपा जाना (17 नवम्बर, 1948 से 9 अप्रैल, 1948 तक) - Page 366

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निर्धारित सामान्य नियमों को स्वीकार करना चाहिए। हम यह अराजकता नहीं चाहते हैं। एक हिंदू सभी उद्देश्यों के लिए हिंदू ही है। यदि कोई आदिवासी व्यक्ति हिंदू नहीं बनना चाहता है तो उसके लिए यह सिद्ध करने के लिए रास्ता खुला है कि वह हिंदू नहीं है और यह विधेयक उस पर लागू नहीं होगा।

मेरे मित्र डॉ. सीता रमैया ने मुझसे यह बताने के लिए कहा कि क्या इस विधेयक के कानूनी नियम, जहां तक महिलाएं उस संपत्ति के पूर्ण भू-भाग को प्राप्त करेंगी जिसको वे विरासत से प्राप्त करती हैं, विधवाओं पर लागू होंगे जिन्होंने इस अधिनियम के पारित होने से पूर्व ही भू-भाग प्राप्त कर लिए हैं। मुझे भय है, मुझे कहना चाहिए कि यह विधेयक पूर्व से प्रभावी नहीं होगा।

साथ ही यह विधेयक इस सामान्य कारण से महिलाओं की पूर्ण संपत्ति के सिद्धांतों के लिए पूर्व प्रभावी किया जाना संभव नहीं होगा कि विधेयक के प्रभावी होने से काफी पहले, उस भू-भाग पर निहित अधिकार बन गए होते और उनको उन अधिकारों से वंचित करना उचित और ठीक नहीं होगा तथापि विधवाओं के साथ हमारी बहुत सहानुभूति हो सकती है।

श्रीमती हंस मेहता ने यह इंगित करते हुए कई प्रश्न उठाए हैं कि महिलाएं और विशेषकर स्वयं वे महिलाओं के अधिकारों से संबंधित विधेयक में दिए गए कुछ उपबंधों से संतुष्ट नहीं हैं। एक आदर्श भावना के रूप में, उनके अनुसार, यह विधेयक उनकी आशाओं के अनुरूप नहीं है। परन्तु मैं उनको बताना चाहता हूँ कि उनको यह जानकारी होनी चाहिए कि यह समाज एक निष्क्रिय समाज है। हिंदू समाज ने हमेशा यह विश्वास किया है कि कानून बनाना या तो ईश्वर का कार्य है या स्मृति का और हिंदू समाज को इसे बदलने का कोई अधिकार नहीं है। इस प्रकार से, हिंदू समाज में कानून वही रहे हैं जो पीढि़यों से चलते आ रहे हैं। समाज ने अपनी सामाजिक, आर्थिक और वैधानिक जीवन को सुधारने में अपनी शक्तियों और जिम्मेदारियों को कभी भी स्वीकार नहीं किया। यह तो पहली बार है कि हम हिंदू समाज को एक ऐसा बड़ा कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं और मुझे इसमें बिल्कुल भी संदेह नहीं है किन्तु समाज, जिसने इस बड़े कदम को सहन करने के लिए पर्याप्त हिम्मत जुटाई है, हमने इस विधेयक को उसे स्वीकार करने के लिए कहा है, वह प्रगति के पथ पर चलने से नहीं हिचकिचाएगा जो कि लक्ष्य तक पहुंचने के लिए बहुत ही दुर्गम है और यह श्रीमती हंसा मेहता के मस्तिष्क में है।

महोदय, इस तथ्य पर बहुत कुछ कह दिया गया है कि अधिकांश जनमत विधेयक के विरुद्ध है। मैंने निश्चित रूप से उन विचारों को महत्व नहीं दिया है जिनको हमने प्राप्त किया, परन्तु मैं यह कहना चाहता हूँ कि यह शायद ही एक प्रश्न है जिसका निर्णय मुण्डों की संख्या गिनकर कर सकते हैं। यह ऐसा प्रश्न नहीं है जिसे हम बहुमत