अनुभाग दो - प्रवर समिति द्वारा संशोधित तत्कालीन हिंदू संहिता सहित डॉ. अम्बेडकर द्वारा तैयार हिंदू संहिता विधेयक का प्रारूप - Page 454

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माननीय अध्यक्षः कृपया शांत रहिए। यहीं मुश्किल आ रही है। जिन परिवर्तनों को प्रवर समिति ने स्वीकार किया है, उन्हें चाहे किसी ने भी किया हो, वे प्रवर समिति द्वारा किए गए परिवर्तन हैं और प्रवर समिति के संज्ञान में लाए बिना किसी के भी द्वारा नहीं किए गए हैं उन्हें इस प्रकार का आक्षेप अथवा स्वीकारोक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं है। परिवर्तन किसी के द्वारा भी किए गए-एक अवसर पर चाहे एक अकेले सदस्य द्वारा अथवा कानून मंत्री अथवा प्रारूप समिति अथवा किसी और के द्वारा इन्हें इस अनुमान पर आगे बात रखनी चाहिए कि ये परिवर्तन वे परिवर्तन हैं, जो प्रवर समिति द्वारा स्वीकार किए गए हैं, और इन्हें यह प्रदर्शित करके दिखाना चाहिए कि वे महत्वपूर्ण परिवर्तन हैं।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः मेरी कठिनाई यह है कि मैं इस बात पर रुक नहीं सकता। माननीय कानून मंत्री ने दावा किया है कि परिवर्तन प्रवर समिति द्वारा किए गए थे, प्रारुप समिति द्वारा नहीं। इससे यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाएगा कि प्रवर समिति ने प्रारुप समिति द्वारा सुझाए गए परिवर्तनों को अनुग्रहपूर्वक और सदाशयी रूप से स्वीकार किया। यदि ऐसा है तो इसे स्वीकार करते हुए प्रवर समिति ने यह जानते हुए भी कि यह एक परिवर्तन है इस पर अपना दिमाग नहीं लगाया। यदि प्रवर समिति नहीं जानती थी, जैसा कि माननीय कानन मंत्री भी नहीं जानते, कि ये परिवर्तन विभागीय समिति द्वारा किए गए थे, उन्होंने किए गए सभी परिवर्तनों को, पूरे सम्मान के साथ नहीं, अपितु तकनीकी रूप से स्वीकार कर लिया। इस तर्क से भी मेरी बात पुष्ट हो जाती है। ये परिवर्तन प्रवर समिति द्वारा मात्र अपनी इच्छानुसार नहीं किए गए, बल्कि उनके द्वारा यह जाने बिना कि वे जिन परिवर्तनों को स्वीकार कर रहे थे, वे महत्वपूर्ण प्रकृति के हैं जिनसे मेरा मामला पुष्ट हो जाता है। वास्तव में, उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से यह मान लिया था कि विभागीय बिल मात्र एक फिर से तैयार किया गया प्रारूप था, जिसमें कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किए गए थे। इसकी पुष्टि इस तथ्य से होती है कि कानूनमंत्री ने भी यह माना कि मैं प्रवर समिति द्वारा किए गए परिवर्तनों का उल्लेख कर रहा हूँ। यही कारण है कि मैं यह तर्क प्रस्तुत कर रहा हूँ कि परिवर्तनों की ओर प्रवर समिति का ध्यानाकर्षित नहीं किया गया। दूसरी ओर, उन्होंने विभागीय बिल को मूल बिल का एक महत्वपूर्ण पुनः प्रस्ततीकरण माना, जिसमें कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं था। मैं कह सकता हूँ कि कोई वास्तविकता जाने बिना_ हम केवल भूलों अथवा अनदेखी करने अथवा सदाशयी त्रुटियों के संबंध में तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं। मुझे इससे बेहतर कोई तर्क प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है।

श्रीमान्, मेरा कहना है कि प्रवर समिति के सदस्यों अथवा कानून मंत्री को इस बारे में बहुत भावनात्मक नहीं होना चाहिए। यह मामला अभिलेखन का है। वास्तव में, यहां तक कि माननीय कानून मंत्री ने भी माना है कि उन्होंने कोई परिवर्तन नहीं किया और वह समझते हैं कि मैं यह तर्क दे रहा हूँ कि परिवर्तन, प्रवर समिति द्वारा किए गए थे।