अनुभाग दो - प्रवर समिति द्वारा संशोधित तत्कालीन हिंदू संहिता सहित डॉ. अम्बेडकर द्वारा तैयार हिंदू संहिता विधेयक का प्रारूप - Page 455

440 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वे उन्हें अपना चुके हैंः जैसे कि आपके द्वारा दी गई व्यवस्था स्वीकार की जानी चाहिए, उन्हें ये परिवर्तन स्वीकार करने चाहिए। किन्तु मैं जो प्रश्न उठा रहा हूँ कि वह यह है कि इनकी जानकारी नहीं दी गई अथवा विधिक तौर पर ध्यान नहीं दिला गया। माननीय मंत्री जी ने कल एक प्रश्न पर कहा था कि विभागीय समिति ने कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किए। महत्वपूर्ण परिवर्तन तो हुए हैं, पर उन्हें विभागीय विधेयक में नहीं दर्शाया गया है। अतः इसमें आक्षेप लगाने जैसा कोई प्रश्न नहीं है।

माननीय अध्यक्षः अब हमें पुनः इस प्रश्न पर चर्चा नहीं करनी चाहिए।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः यह एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था। श्रीमान्, मैंने सोचा था कि मैं ठोस आधार पर कदम रख रहा हूँ। किंतु सुस्पष्ट मामलों को उजागर करना यदि प्रवर समिति के सदस्यों को अपराध लगता है, तो मुझे बहुत खेद है।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः आप सदस्यों के विरुद्ध ऐसा आक्षेप नहीं लगा सकते।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः कैसा आक्षेप कि उन्होंने गलतियां की हैं? गलती करना मानवीय स्वभाव है। मैं केवल यह सुझा रहा था कि प्रवर समिति के सदस्य भी मानव ही थे।

श्री बी. दासः मुझे व्यवस्थागत् आपत्ति है। श्रीमान्, क्या माननीय सदस्य लगातार तीन महीनों तक प्रवर समिति की कमियों को उजाकर करते रह सकते हैं? मुद्दा उठा और उसका निपटान हो गया। मैं उनके शब्दों को स्वीकार करता हूँ अथवा नहीं, यह एक अलग प्रश्न है। किन्तु माननीय सदस्य इस तरह से अड़ंगेबाजी वाले अंदाज में अपनी बात जारी नहीं रख सकते हैं, जैसा कि कुछ वर्ष पहले मेरे मित्र श्री बैजनाथ बेजोरिया ने बाल-विवाह अधिनियम पर मेरे संशोधन के समय किया था। वे शास्त्रों तथा अन्य पुस्तकों के कथनों के उद्धरण देते रहे थे। यहां बेचारी प्रवर समिति पर मेरे मित्र श्री नजीरुद्दीन अहमद द्वारा गत तीन महीनों से प्रहार किए जा रहे हैं। यह कोई कानूनी अदालत नहीं है। श्रीमान् आप इनसे इस पर अपने विचार रखने को कह सकते हैं कि हिंदू संहिता विधेयक पारित नहीं होना चाहिए। हमे प्रवर समिति के विरुद्ध क्यों लम्बी बातचीत करते रहनी चाहिए? इस सदन के सबसे पुराने सदस्य होने के नाते, मैं इसे नहीं समझ सकता।

माननीय अध्यक्षः माननीय सदस्य केवल महत्वपूर्ण परिवर्तनों का ही उल्लेख करें।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः जी, श्रीमान्। श्रीमान्, मुझे आपत्ति है कि मेरे भाषण को अड़ंगेबाजी वाला भाषण कहा जाता है। मैं सोचता हूँ कि माननीय सदस्य थोड़ा गलत दिशा में बढ़ गए हैं। इससे प्रतीत होता है कि उन्होंने पूरी तरह से अपने मस्तिष्क पर ताला लगा लिया है और अब वे कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हैं।