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ऽहिंदू विवाह विधिमान्यता विधेयक
पंडित ठाकुर दास भार्गव (पूर्वी पंजाबः सामान्य)ः मैं प्रस्तुत करता हूँ फ्कि हिंदुओं, सिक्खों, जैनियों और उनकी विभिन्न जातियों तथा उप-जातियों के विवाहों को विधि-मान्य बनाने वाले विधेयक को प्रवर समिति को भेजा जाए, जिसके ज्ञान गुरुमुख सिंह मुसाफिर, सरदार हुकुम सिंह, श्री एम. अनन्तसयनम् आयंगर, श्री देशबंधु गुप्ता, श्रीमती जी. दुर्गाबाई, श्रीमती रेणुका रे, श्री रामनाथ गोयनका, डॉ. बक्शी टेक चंद, लाला अंचित राम, चौ. रणबीर सिंह, श्री महावीर त्यागी और प्रस्ताव्य सदस्य और समिति की बैठक के लिए कम से कम पांच सदस्य अनिवार्य रूप से उपस्थित होंगे।य्
महोदय, आपकी अनुमति से इस प्रस्ताव को रखते हुए, इसके बारे में बताना चाहता हूँ कानून की वर्तमान स्थिति क्या है। इस समय, हिंदू, सिख और जैनों पर सभी मामलों में हिंदू कानून लागू होता है। जहां तक विवाह का संबंध है। इस समय हिंदू कानून के अनुसार विभिन्न जातियों के पुरुष तथा महिलाओं में विवाह विधिमान्य नहीं हैं, सिवाए बम्बई के जहां ‘अनुलोम’ विवाह की अनुमति है परन्तु ‘प्रतिलोम’ विवाह की अनुमति नहीं है। इलाहाबाद, मद्रास और कलकत्ता में भी उच्च न्यायालयों ने निर्णय दिया है कि ‘अनुलोम’ विवाह विधिमान्य नहीं है।
जहां तक विभिन्न धर्म के लोगां का संबंध है, मैं कहना चाहता हूँ कि इस मामले में भी स्थिति अनिश्चित है। रीति-रिवाजों के अनुसार किसी भी प्रकार के विवाह की अनुमति है जबकि हिंदू कानून के कड़े सिद्धांतों के अनुसार इसकी अनुमति नहीं हो सकती है। उदाहरण के तौर पर पंजाब में और कड़े हिंदू विवाह कानून के अनुसार विभिन्न समुदायों के बीच इसकी अनुमति नहीं है यहां तक कि करवारी और चन्द्रदारी विवाहों की अनुमति हैं, परन्तु कुछ स्थानों पर रीति-रिवाजों के अनुसार ऐसे विवाहों की अनुमति है। उदाहरण के तौर पर नेपाल में ऐसे विवाह विधि सम्मत हैं। पंजाब में, जहां जातिवाद नहीं है, न्यायालय द्वारा नहीं बल्कि समाज द्वारा सामान्यतः हिंदुओं और सिखों के बीच विवाह मान्य हैं। उनके बच्चों को भी उतराधिकारी माना है। जैसा कि कानून के अनुसार विवाह से मिलता है। पहले हिंदू और जैनियों के बीच विवाह नहीं होते थे परन्तु अब स्थिति बदल गई है और हिंदुओं और जैनियों के बीच भी विवाह होते हैं, विशेषकर जैन अग्रवालों और हिंदू अग्रवालों के बीच, परन्तु एक जैन अग्रवाल का विवाह एक शूद्र या ब्राह्मण के साथ मान्य नहीं है। जहां तक सब-डिविजन और उपजातियों का संबंध है, 1946 का अधिनियम पारित होने से पहले कुछ स्थानों पर समुदायों के सब-डिवीजनों के बीच विवाह वैध था और कुछ स्थानों पर अवैध था। परन्तु यह मुद्दे से हटकर हैं यदि सब डिवीजन और
ऽसंविधान सभा, वाद-विवाद, खंड 1, 11 फरवरी, 1949, पृष्ठ 419-28