अनुभाग तीन - प्रवर समिति से वापस भेजे जाने के पश्चात् हिंदू संहिता पर की गई चर्चा (11 फरवरी, 1949 से 14 दिसम्बर, 1950 तक) - Page 499

484 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उपजाति एक ही है, तो यहां उपजाति शब्द का इस्तेमाल ठीक नहीं है। मुख्य जाति के सब-डिवीजन के सदस्यों के बीच विवाह को पहले ही विधिसम्मत बना दिया गया है। शेष के मामले में, उदाहरण के तौर पर, यदि भिन्न-भिन्न धर्मों और भिन्न-भिन्न जातियों के सदस्य विवाह करना चाहते हैं, तो ऐसे विवाह वैध नहीं है। इस समय लोगों की मांग है कि ऐसा होना चाहिए और भिन्न-भिन्न धर्मों और भिन्न-भिन्न जातियों के लोगों के बीच विवाह वैध बनाया जाए। इस समय ऐसे अनेक युवा पुरुष और युवा महिलाएं हैं जो अपनी जाति से बाहर विवाह करना चाहते हैं। जहां तक लोगों की राय का सम्बन्ध है, मुझे विश्वास है कि हम इस दिशा में एक ठोस नींव रख रहे हैं।

देश के हित की दृष्टि से, मैं सदन को बताना चाहता हूँ कि पंजाब में हिंदुओं और सिखों के बीच भेदभाव समाप्त हो जाए और वे एक बन जाएं, यदि सैकड़ों हिंदू और सिख लड़कियां और लड़के आपस में विवाह कर लें, तो यह समस्या समाप्त हो गई होती। वास्तव में, मेरा विश्वास है कि यदि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच विवाह हुए होते, तो आज पाकिस्तान नहीं बनता। यदि अन्तर्विवाह को एक पंरपरा के रूप में स्वीकार कर लें, तो मुझे विश्वास हैं कि भिन्न-भिन्न जातियों और धर्मों के बीच यह कटुता समाप्त हो जाएगी। मेरी समझ में नहीं आता कि हम इसे क्यों नहीं अपना सके हैं। यह कहा जा सकता है कि हिंदू धर्म के सिद्धान्त ऐसा नहीं करने देंगे, परन्तु हम विरोधी बातों को नहीं अपनाएंगे। मैं बताना चाहता हूँ कि महाभारत के श्लोक में लिखा है कि धरती पर बहुत ज्यादा क्षत्रिय नहीं हैं, इसलिए कुछ ब्राह्मणों को लाया जाए, जो प्रजनन करेंगे। हमारा धर्म और वैदिक अनुश्रुति हमें बताती है कि हिंदुओं में ऐसे विवाह कोई कम नहीं होते थे। वास्तव में, जाति प्रणाली रूढि़बद्ध होने से पहले, हिंदुओं में अन्तर्जातीय विवाह पर कोई रोक नहीं थी। अतः इसमें सुधार लाने की दृष्टि से, मैं समझता हूँ कि यह कदम उठाने में कोई कठिनाई नहीं है।

परन्तु, इसके साथ ही, मैं कहना चाहता हूँ कि इस कदम से एक अधिकार मिल जाएगा। यह किसी को अपनी जाति से बाहर विवाह करने के लिए बाध्य नहीं करता। यदि एक व्यक्ति ऐसा चाहता है, यदि एक युवा पुरुष और एक युवा महिला ऐसा चाहते हैं, यदि उनके माता-पिता ऐसा चाहते हैं, तो उन्हें ये अधिकार मिलना चाहिए और उनके बच्चे वैध होने चाहिए। इस समय यदि एक हिंदू अपनी जाति के बाहर विवाह करना चाहता है, यह ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि वह झूठ का सहारा लेकर अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर सकता। आर्य विवाह विधिमान्य अधिनियम के अन्तर्गत वह अपनी जाति से बाहर किसी हिंदू से विवाह कर सकता है। मान लो कोई व्यक्ति आर्य समाज से संबंधित नहीं है, तो वह अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए झूठ का सहारा क्यों ले? अतः, कानून में इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि लोगों को यह कानूनी अधिकार मिलना चाहिए। मैं यह भी जानता हूँ कि विशेष विवाह अधिनियम, 1872 (1872 का अधिनियम III ) के