अनुभाग तीन - प्रवर समिति से वापस भेजे जाने के पश्चात् हिंदू संहिता पर की गई चर्चा (11 फरवरी, 1949 से 14 दिसम्बर, 1950 तक) - Page 530

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दो परिवर्तन किए हैं। पहला परिवर्तन यह किया गया है कि यदि वास्तविक संरक्षक सांसारिक जीवन त्याग देता है या हिंदू धर्म छोड़ देता है, तो नावालिग पुत्र का पिता होने का अधिकार उससे ले लिया जाता है। मूल कानून यह कहता है कि परिस्थितियों में कोई भी बदलाव आए, चाहे वास्तविक संरक्षक के धर्म परिवर्तन करने की कोई परिस्थिति हो जाए, वह नावालिग पुत्र का संरक्षक बना रहता है। समिति का विचार है कि चूंकि यह संहिता हिंदू समाज और उसके कानूनों को सुदृढ़ बनाने के लिये हैं, इसलिए यह वांछनीय होगा कि एक पिता तब तक वास्तविक संरक्षक रहेगा जब तक कि वह हिंदू हैं। संशोधित संहिता में एक और परिवर्तन किया गया है कि यदि एक विधवा के पति ने कोई वसीयती संरक्षक नहीं किया है, तो विधवा को वसीयती संरक्षक नियुक्त करने का अधिकार दिया गया है। उनके पास पहले ऐसा अधिकार नहीं था और यह अधिकार उसे प्रवर समिति ने दिया है।

महोदय, अब मैं विधेयक के उस भाग पर आता हूँ जिसमें उत्तराधिकार की व्यवस्था है और सबसे पहले पुरुष के उत्तराधिकार के बारे में किए गए परिवर्तनों के बारे में बताऊंगा। अब जैसा कि पहले से हम जानते हैं जो हिंदू विधि में उत्तराधिकार की संहत शृंखला है उसे राव समिति ने पहले क्रम में रखा है, का सरोकार है। इसमें प्रवर समिति ने परिवर्तन नहीं किया है। संहत शृंखला को बताख और क्रम में वैसे ही रखा गया है। इस मामले में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। परन्तु राव समिति ने खंड 1 से खंड 4 में जिन व्यक्तियों को शामिल किया है उसमें उत्तराधिकार की पंक्ति और उत्तराधिकार की प्राथमिकता में कुछ परिवर्तन किया गया है। समिति ने दोनों सिद्धांतों का पालन किया है अर्थात् रिश्ता और प्यार और उसके आधार पर प्रवर समिति ने मूल विधेयक के खंड 1 से खंड 4 में दिए वारिसों में कुछ परिवर्तन किया है। प्रवर समिति ने एक काम और भी किया है। गोत्रजों और सजातियों की डिग्री की संख्या कम की है, जोकि मृतक के वारिस बन सकते हैं और इसने अन्य वारिसों को निकाल दिया है जैसे कि वे वारिस जो रिश्तेदार नहीं हैं, जैसे कि साम ब्रह्मचारी गुरु आदि। प्रवर समिति द्वारा मूलविधेयक में दिए गए वारिसों में कटौती करने का कारण इस प्रकार है। इस संहिता में प्रत्येक हिंदू को अपनी वसीयत लिखने का अधिकार दिया जा रहा है। एक बहुत ही महत्वपूर्ण पत्रिका जिसका नाम कम्पोटिव ....में। आलोचना प्रकाशित हुई है। इसमें एक बहुत ही प्रसिद्ध वकील ने कहा है कि जब वसीयत लिखने का अधिकार दिया जा रहा है तो वारिसों की इतनी लम्बी सूची, 14 डिग्री तक देना अनावश्यक है। यदि मृतक की दिलचस्पी सूची की चौदहवीं डिग्री में शामिल किसी रिश्तेदार में हैं और वह उसकी मृत्यु के समय जीवित है, तो वह वसीयत कर सकता है और वह अपनी सम्पत्ति का कोई भाग उस व्यक्ति को दे सकता है, जिसमें उसकी दिलचस्पी है।