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हिंदू संहिता - जारी
माननीय अध्यक्ष : जैसा कि प्रवर समिति ने सूचित किया है, सभा अब हिंदू कानून में संशोधन तथा इसकी कुछ शाखाओं को संहिताबद्ध करने संबंधी विधेयक पर पुनर्विचार करेगी। इस समय खंड 2 चर्चाधीन है।
श्री गौतम (उत्तर प्रदेश) : चर्चा शुरू करने से पहले मैं आपसे एक प्रश्न पर स्पष्टीकरण करने का अनुरोध करता हूँ। मुझे पता चला है - कल दोपहर मैं यहां उपस्थित नहीं था, इसलिए मैं इस प्रश्न को उठा रहा हूँ - कि किसी वक्ता ने इस विशेष खंड पर चर्चा के दौरान भाषा का प्रयोग किया था जिसका कुछ सदस्यों ने विरोध किया था। क्या माननीय सदस्यों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया गया है। महोदय, मैं आपसे अनुरोध करूंगा कि आप इन चीजों के संबंध में कतिपय अनुदेश जारी करें ताकि सदस्य अपनी सीमा में रहें तथा अन्य सदस्यों की भावनाओं को ठेस न पहुंचाएं।
श्री एम. ए. आयंगर (मद्रास) : महोदय, मैं पूछ सकता हॅँ कि क्या हुआ?
माननीय अध्यक्ष : उन्हें उन बातों को दोहराने की जरूरत नहीं है।
श्री एम. ए. आयंगर : नहीं, मैं उन वाक्यांशों को नहीं दोहरा रहा हॅँ क्योंकि इससे उसका उद्देश्य विफल हो जायेगा। कल जब एक माननीय सदस्य बोल रहे थे तो दुर्भाग्य से उनके मुख से कुछ शब्द निकले, निस्संदेह वह हमेशा अच्छा मजाक करते हैं और उनकी बात पर बुरा नहीं माना जाता है। दुर्भाग्य से यह मजाक अवांछनीय बन गया। जैसे ही मुझे मेरे पीठासीन होने के दौरान बताया गया, मैंने आदेश दिया कि कथन के उस भाग को कार्यवाही से निकाल दिया जाये। मैंने सोचा कि मामला वहीं पर समाप्त हो गया। मेरे विचार से सभी सहमत हैं - तथा माननीय सदस्य ने अनजाने में कहे गये शब्दों पर अफसोस भी कम नहीं है - कि वह बात समाप्त हो गई है। यह कार्यवाही वृत्तांत का हिस्सा नहीं है। मेरे विचारों से इस मामले को आपके समक्ष किसी विशेष कार्यवाही के लिए दोबारा उठाने की आवश्यकता नहीं है।
माननीय अध्यक्ष : मुझे विश्वास है कि सदस्य इस बात को ध्यान में रखेंगे तथा इस तरह अपनी बात कहेंगे अथवा टिप्पणी करेंगे कि इस तरह की बातों को दोहराने का फिर अवसर न आये।
श्री फ्रैंक एन्थोनी (मध्य प्रदेश) : सत्ता पक्ष के सदस्यों द्वारा गलत उदाहरण प्रस्तुत किया गया है।
* सं. वा. वि. भाग VIII, खंड II, 7 फरवरी, 1951, पृष्ठ 2486-2537