572 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय उपाध्यक्ष : तब तो प्रत्येक माननीय सदस्य एक-एक संशोधन प्रस्तुत करेगा जिससे कि उसे बोलने की अनुमति मिल सके। ऐसा मापदण्ड नहीं हो सकता है। सभाध्यक्ष से यह अपेक्षा की जाती है कि वे पक्ष-विपक्ष को तौल कर यह निष्कर्ष निकालें कि क्या किसी विशेष मसले पर पर्यापत तर्क-वितर्क हो चुका है अथवा नहीं। ऐसा भी संभव है कि कोई ऐसा सदस्य जिसने संशोधन सारणीबद्ध किया हो उसने इस पर जोर नहीं डाला; परन्तु कुछ अन्य सम्माननीय सदस्यों द्वारा ऐसा किया गया हो, संभवतः अत्यधिक वाक्पटुता और जोर-जबर्दस्ती से। श्री नजीरुद्दीन अहमद : नहीं, महोदय।
माननीय उपाध्यक्ष : इस प्रश्न पर तीसरे व्यक्ति द्वारा निर्णय लिया जाना चाहिए, और मैं अनुभव करता हूँ कि इस मसले पर पर्याप्त चर्चा हो चुकी है।
श्री श्यामनंदन सहाय : इन संशोधनों में उठाए गए बिन्दु भिन्न हैं। यह बिल्कुल विपरीत विषय है यदि एक जैसे संशोधनों पर एक साथ चर्चा की गई है। परन्तु इन संशोधनों के ऐसे विशेष पहलू हैं जिन पर जोर नहीं डाला गया है और इन पर विचार अवश्य ही किया जाना चाहिए। वह ऐसा ही एक प्रस्ताव है। हमें यहाँ और अभी एक बार और सदा के लिए निर्णय लेना है कि ग्रन्थ, रीति-रिवाज और प्रथाओं के अनुसार चलना निश्चित करना होगा। इसलिए, इस धारा की महत्ता पूरे विधेयक की किसी भी अन्य धारा जिस पर आप चर्चा करना चाहते हों, उससे कहीं अधिक है।
माननीय उपाध्यक्ष : अब जबकि यह प्रश्न उठाया गया है। मैं माननीय कानून मंत्री से पूछना चाहूँगा कि क्या जो कहा गया है उसको मद्देनजर रखते हुए दोनों पक्षों में ‘‘असंगति’’ शब्द का उपयोग करना संभव है।
डॉ. अम्बेडकर : यह दूसरा विषय है। यदि आप मुझे एक अवसर देंगे तो मैं इसे बदलने का प्रस्ताव नहीं रखूँगा। ऐसा क्यों है, मैं इसको स्पष्ट करूँगा।
पंडित मालवीय : महोदय, अब सदन के नेता उपस्थित हैं, क्या हम उनसे निवेदन कर सकते हैं?
माननीय उपाध्यक्ष : नहीं। मैं समझता हूँ कि काफी विचार-विमर्श हो चुका है।
प्रश्न है :
‘‘कि क्या अब प्रश्न रखा जाए’’
सदन विभाजित हो गया : हाँ 63 या नहीं 34।