हिंदू कोड-जारी - Page 589

574 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

* डॉ. अम्बेडकर : मैं पहले ही स्पष्ट कर चुका हूँ जब मैंने पूर्व में हस्तक्षेप करते

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हुए कहा था कि धारा 4 के अंतर्गत, जो इस चर्चा का मुख्य विषय है, रीति-रिवाजों की वास्तविक रूप से क्या स्थिति है। उस समय मैंने स्पष्ट किया था कि जहाँ तक धारा 4 का संबंध है ये यह बात नहीं कहती है कि किसी भी रीति-रिवाज को मान्यता नहीं दी जोयगी।

धारा 4 में मेरा संशोधन है ‘‘संहिता में अभिव्यक्त रूप से जैसा उपबंधित है, उसके सिवाय’’ इसका अर्थ है कि यदि संसद किसी विशिष्ट धारा के प्रवर्तन से किसी विशिष्ट रिवाज को बचाने के लिए सहमति देती है तो ऐसा करने के लिए संसद को उस समय भी छूट है। इसलिए यह संसद सदस्यों की ओर से पूर्णतः गलत है जिन्होंने रीति-रिवाज के प्रश्न पर यह सुझाने के लिए विस्तृत विवेचन किया है कि यह धारा ऐसी अंकित की गई है जिससे प्रथा के लिए कोई कक्ष अथवा स्थान न खाली रहे। जो सब इस संहिता के संबंध में कहा गया है, साथ ही मेरा दिमाग भी रिवाजों को बंद करने का प्रयत्न करने में लगा हुआ है, यह सब पूर्ण भ्रांति पर आधारित है। जैसा मैं पूर्व में ही कह चुका हूँ यह उस समय भी उन संसद-सदस्यों के लिए विधेयक की प्रासंगिक धारा के अंतर्गत प्रश्न उठाने के लिए खुला हुआ होगा जो किसी विशिष्ट रिवाज के पक्षपाती हैं, जब इस पर चर्चा आरम्भ की जायेगी और मैं अपने विचारों की अभिव्यक्ति करने के इस पर चर्चा आरम्भ की जायेगी और मैं अपने विचारों की अभिव्यक्ति करने के लिए समर्थ हो सकूँगा कि क्या मैं उस प्रथा को स्वीकारने की स्थिति में हूँ अथवा मैं उस स्थिति में नहीं हूँ कि उस प्रथा को अपना सकूँ। इस प्रकार से, वह स्थिति निश्चित रूप से सुरक्षित है अगर धारा 4 उसी प्रकार से पारित की जाती है जैसे मैंने इसे पारित करने का सुझाव दिया था।

केवल अन्य विषय जिसका मैं उल्लेख करना चाहता हूँ, मेरे मित्र श्री थेबल ओराँव जो किसी एक आदिवासी जाति के हैं द्वारा बनाया गया विषय-बिंदु है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने धारा 2 के उपबंध नहीं पढ़े हैं जिसे इस सदन ने पहले ही पारित कर दिया है। धारा 2 की उप-धारा (2) बताती है कि किन व्यक्तियों पर यह लागू नहीं होगी। उसके लिए इसमें एक प्रतिबंध है। मेरा निवेदन है कि ऐसे लोगों के मामले में जो किसी विशेष जाति के ऐसे लोगों के मामले में जो किसी विशेष जाति से संबंध रखते हैं और वे जाति पूर्णरूपेण संपूर्णतः हिंदू नहीं हैं- जिससे उनके संबंध में हम कह सकें कि हिंदू कानून उसी प्रकार लागू किया जाता है जैसे यह उन लोगों पर लागू किया जाता है जो वास्तव में और कानूनतः डी. जुरे (वस्तुतः) और

* संसदीय वाद-विवाद, खंड XV भाग II, 22 सितंबर, 1951, पृष्ठ 3183-88