86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
नियमित सेना के किसी निकाय के साथ कार्य कर रहा हो या धारा-5 के अधीन किसी अधिसूना के अनुसरण में उसे केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण में रखा गया हो।य्
अतः, यह बिल्कुल ऐसा नहीं है जैसे कि यह विधि भाग ‘ख’ राज्यों में बलों को एक पृथक बंद डिब्बे में रखती है। जब केन्द्रीय सरकार खंड 5 के अधीन कोई अधिसूचना जारी करती है, तब अधिसूचना जारी होते ही यह अधिनियम स्वतः भाग ‘ख’ राज्यों में सेना के उस भाग को लागू हो जाएगा। उन्हें यह भी पता चलेगा कि खंड 5 के अधीन केन्द्रीय सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए ही शक्ति दी गई है कि भाग ‘ख’ राज्यों के बलों के किसी विशिष्ट भाग को इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए भारतीय सेना से सम्बद्ध समझा जाएगा। जहाँ तक कतिपय बलों के सम्बद्ध होने का संबंध है, यह मध्यक्षेप करने की एक प्रत्यक्ष शक्ति भी है।
मेरे मित्र ने पूछा था कि हमने प्रत्यक्ष कार्यवाही क्यों नहीं की। मेरे मन में इसका उत्तर स्पष्ट है। वे समझ पाएँगे कि भाग ‘ख’ राज्यों में बलों की भर्ती उनकी अपनी-अपनी व्यक्तिगत विधियों के अधीन की गई थी और केन्द्रीय सरकार के किसी अधिनियम के अधीन नहीं की गई थी। भाग ‘ख’ राज्यों में की गई भर्ती शर्तें भारतीय नियमित सेना में कार्मिकों की भर्ती संबंधी नियमों और शर्तों से तात्त्विक रूप से भिन्न थीं। एक महत्त्वपूर्ण अंतर यह था कि भारतीय नियमित सेना में भर्ती किए गए व्यक्ति किसी भी जगह सेवा करने के लिए आबद्ध थे किन्तु भाग ‘ख’ राज्यों से संबंधित बलों में भर्ती किए गए व्यक्ति के संबंध में ऐसी कोई शर्त नहीं है। मेरा विचार है कि प्रत्येक व्यक्ति को इस बात की जानकारी है कि उनकी सेवा-शर्तें उनके राज्यों तक ही समिति होता है और उनकी सेवाओं की सबसे विस्तृत परिधि भारत है। युद्ध के दौरान विशेष उपबंध किया गया था और इन सैन्य दलों को इस शर्त पर भारत सरकार के नियंत्रण में दिया गया था कि उनका उपयोग कहीं भी किया जा सकता है। भारत सरकार ने सभी व्यय वहन किए थे और उन्हें भारत के बाहर युद्ध क्षेत्रों में भेजा था। ऐसा होते हुए, यह कुछ कठिन, कठोर और अवैध-सा प्रतीत होता है कि एक व्यक्ति को, जो कि भिन्न परिस्थितियों के अंतर्गत भर्ती हुआ है, बुलाकर नियमित सेना का भाग बना दिया जाए। परिणामतः यह तथ्य कि अंगीकार करने के लिए हमारे पास राज्य-बलों के साथ प्रसंविदाएँ हैं कि हम एक प्रकार का मध्य मार्ग अपना सकते हैं और मैं नहीं समझता कि किसी भी दृष्टि से
खंड 4 और 5 में अंतर्विष्ट उपबंधों पर कोई आपत्ति की जा सकती है।
अब, मैं उनके द्वारा उठाए गए दूसरे बिन्दु पर, अर्थात् खंड 70 पर आता हूँ। वह सेना न्यायालय द्वारा असैनिक अपराधों के नाम से ज्ञात अपराधों के विचारण के प्राधिकार से संबंधित है। यह पूर्णतया सत्य है कि असैनिक व्यक्तियों के प्रति अपराधों का विचारण सिविल न्यायालयों द्वारा ही किया जाना चाहिए, न कि सेना न्यायालयों द्वारा, किन्तु ऐसे तर्क हैं जो दूसरे पक्ष को बल देते हैं और विधेयक में अंतर्विष्ट उपबंधों को समर्थन